भोपाल। भिंड-मुरैना में 19 जुलाई को सिंथेटिक दूध व मावा बनाने के ठिकाने पकड़ाने के बाद प्रदेशभर में लिए गए सैंपलों में करीब 50 फीसदी फेल हो रहे हैं। इसके पहले तक अधिकतम 19 फीसदी ही सैंपल फेल होते थे। जबकि सेंपल लेने व जांच का तरीका वही पुराना है। जांच नतीजों में इतना बड़ा फर्क होने से पहले की सैंपलिंग और जांच पर सवाल खड़े हो गए हैं। इधर, दो माह में मिलावटखोरी की मामले में 16 व्यापारियों पर रासुका लगाया जा चुका है। इसके बाद भी मिलावट का खेल जारी है।

खाद्य एवं औषधि प्रशासन के पिछले पांच साल के आंकड़े देखें तो अलग-अलग साल में 12 से 19 फीसदी तक सैंपल फेल हुए थे। इस साल सिंथेटिक दूध-मावा पकड़े जाने के बाद प्रदेशभर में विशेष अभियान चलाकर सैंपल लिए गए। मुख्यमंत्री, स्वास्थ्य मंत्री, मुख्य सचिव और अन्य आला अधिकारियों की सैंपल लेने की प्रक्रिया और जांच पर नजर रही। कई जिलों में अधिकारियों की मौजूदगी में सैंपल लिए गए। नतीजा यह रहा कि सैंपल लेने में किसी तरह गड़बड़ी की गुंजाइश नहीं रही। उधर, लैब में भी जांच की गुणवत्ता बढ़ाई गई।

दूध व दूध से बने सैंपलों की पहले छह मापदंडों पर जांच की जाती थी। सिंथेटिक दूध-मावा मिलने के बाद 15 मापदंडों पर जांच शुरू की गई। मापदंड (पैरामीटर) कम होने की वजह से मिलावट करने वाले पहले बच जाते थे। जांच में ज्यादातर सैंपल अमानक श्रेणी में आते थे। इस साल जांच में करीब 20 सैंपल असुरक्षित श्रेणी के मिले हैं। इनमें डिटर्जेंट की मिलावट पाई गई है। डिटर्जेंट मिली खाद्य सामग्री के सेवन से किडनी फेल होने व कैंसर का खतरा रहता है। अभी लिए गए सैंपलों में कोडिंग की व्यवस्था भी और कठिन कर दी गई, जिससे लैब के कर्मचारियों को यह पता नहीं चल सकता कि सैंपल कहां के हैं और किस खाद्य सुरक्षा अधिकारी ने लिए हैं।

गड़बड़ी न हो, इसलिए सॉफ्टवेयर से लिए जाएंगे सैंपल

खाद्य सुरक्षा अधिकारी सैंपल अपनी मर्जी की दुकान या चीज का न लें, इसलिए इसमें बदलाव किया जा रहा है। एक सॉफ्टवेयर तैयार कराया जा रहा है, जिसमें कुछ दुकानों का सॉफ्टवेयर से चयन किया जाएगा। अधिकारियों को इसकी जानकारी नहीं दी जाएगी। उन्हें संबंधित क्षेत्र में पहुंचने के लिए कहा जाएगा। अभी यह आशंका रहती है कि कोई खाद्य सुरक्षा अधिकारी व्यापारी से बात कर सिर्फ अच्छी गुणवत्ता के ही सैंपल लें।

साल जांचे गए सैंपल फेल फेल प्रतिशत

1 अप्रैल 2018 से 31मार्च 19 7063 1352 19

1 जनवरी 2017- 31 दिसंबर 18 6378 962 15

1 अप्रैल 2016- 31 दिसंबर 17 3980 482 12

1 अप्रैल 2015-31 दिसंबर 16 7518 1010 13

1 अप्रैल 2014-31 दिसंबर 15 7220 1199 16

दिसंबर के पहले शुरू नहीं हो पाएगी माइक्रोबायोलॉजिकल जांचें

खाद्य एवं औषधि प्रशसन के अफसरों ने कहा था कि भोपाल स्थित राज्य खाद्य प्रयोगशाला में माइक्रोबायोलॉजिकल जांचों (बैक्टीरिया, फंगस आदि) की सुविधा इस साल 2 अक्टूबर से शुरू हो जाएगी। मौजूदा तैयारियों को देखते हुए दिसंबर के पहले यह जांचें शुरू होने की उम्मीद नहीं है। इसकी वजह सिविल कार्य में देरी होना है। 2 अक्टूबर को सिविल कार्य पूरा करने की समय सीमा रखी गई है। इसके बाद मशीनें इंस्टाल करने का काम शुरू होगा। इस बात की भी जांच कराई जाएगी कि लैब में कहीं बैक्टीरिया, फंगस और अन्य जीवाणु तो मौजूद नहीं है। इसके बाद लैब शुरू की जाएगी।

इसी बीच किट्स और केमिकल की खरीदी भी की जाएगी। यह जांच नहीं होने से यह पता नहीं चल पा रहा है कि सब्जियां सीवेज के पानी में तो नहीं उगाई गई हैं। फलों या अन्य खाद्य पदार्थों के दूषित होने की वजह से उनमें बैक्टीरिया तो पैदा नहीं हो गए हैं।

सैंपलिंग में अब किसी तरह की गड़बड़ी नहीं की जा सकती। राज्य खाद्य प्रयोगशाला में सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। किसी तरह की गड़बड़ी की शिकायत मिली तो कर्मचारी-अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। इसके पहले इन सब बातों पर सख्ती नहीं की जा रही थी, इस वजह से कम सैंपल फेल हो रहे थे।

तुलसी सिलावट, स्वास्थ्य मंत्री