Naidunia Manoj Tiwari Column: मनोज तिवारी, भोपाल। महिला और बच्चों से जुड़े एक विभाग में लंबे समय तक मलाईदार पदों पर पदस्थ रहे अधिकारियों ने अब घरोंदा छोड़ना शुरू कर दिया है। कुछ अधिकारियों ने दूसरे ठिकाने तलाश लिए हैं, तो कुछ तलाश में जुटे हैं। दरअसल, इन अधिकारियों के लिए विभाग बेगाना हो गया है। विभाग में 'शिकारी" जो आ गया है। एक ऐसा शिकारी जिसकी हर शख्स पर नजर है। अब जाहिर सी बात है, कोई लगातार नजर रखेगा, तो जिसकी जोड़-तोड़ की आदत पड़ गई हो, वह क्या करे इसलिए लंबे समय से कुर्सियां बदल-बदल कर गोटियां जमा लेने वाले अधिकारियों ने इस बार जगह बदलने में ही भलाई समझी और जोड़-तोड़ कर पिंजरे (कक्ष) खाली कर गए। हमेशा दूसरे पंक्ति में रहने वाले अधिकारियों को इनके जाने से कितना फायदा मिला, ये तो वे ही जानें, पर विभाग को जरूर फायदा मिलेगा। कुछ समय के लिए ही सही जोड़-तोड़ की राजनीति से बचेगा।

एक बंगला मिले न्यारा

अपनी बेबाकी के लिए पहचाने जाने वाले एक मंत्री इन दिनों 'एकांत" की तलाश में हैं। वे भले ही लाव-लश्कर के साथ चलते हों, कुछ खास लोग हमेशा साथ रखते हों, पर चाहिए एकांत। सर्किट हाउस में रुकना उन्हें अब पसंद नहीं आता है। अब मंत्रीजी की पसंद-नापसंद का ध्यान विभाग के अधिकारी नहीं रखेंगे, तो कौन रखेगा। अधिकारियों ने अपनी यह जिम्मेदारी बखूबी निभाई। मंत्रीजी को सर्किट हाउस में न रुकना पड़े, इसलिए जबलपुर और इंदौर में अधिकारियों के बंगले खाली करा लिए गए। ताकि दौरे के समय मंत्रीजी बंगले में रुक सकें। अब बंगले मंत्रीजी के लिए आरक्षित हो गए, तो उनके लायक भी होना चाहिए इसलिए विभाग ने दोनों जगह करीब 20 लाख रुपये खर्च कर बंगलों का रंगरोगन करा दिया। जब मंत्री शहर में होते हैं, तो आराम इन्हीं बंगलों में करते हैं और कुछ खास को छोड़कर इनमें किसी को इंट्री नहीं है।

मैडम को चाहिए लग्जरी गाड़ी

अशासकीय पदाधिकारी के रूप में एक शैक्षणिक संस्थान में नियुक्त हुईं एक मैडम को लग्जरी गाड़ी की सवारी करना है। मैडम का मानदेय भले ही 10 हजार रुपये महीना हो, पर उन्हें 10 लाख रुपये से भी महंगी गाड़ी चाहिए। दरअसल, उन्हें महीने में कई बार घर से राजधानी तक आना है। यह दूरी करीब 200 किमी पड़ती है। ऐसे में लग्जरी गाड़ी न हो, तो सफर कष्टदायक हो जाता है। अब जिस पृष्ठभूमि से मैडम आई हैं, उसे देखते हुए कौन है जो उन्हें मना करे। लेकिन करें भी क्या? जिस संस्थान में उन्हें पद मिला है, वहां वर्तमान में निर्णायक की भूमिका में प्रभारी हैं। वह भी शासन का व्यक्ति। तो गाड़ी खरीदना संभव नहीं है। ऐसे में मैडम को भी संतुष्ट करना है। आखिर उन्हें 'थाली में चंदा मामा दिखाकर" यानी किराए पर महंगी गाड़ी लेकर बहलाया जा रहा है। अब मैडम कब तक बहलती हैं, ये वही जानें।

जहां नहीं चैना, वहां नहीं रहना

एक अधिकारी इन दिनों खासे दुखी हैं। दुख भी दोहरा है। साहब कोई अच्छी कुर्सी पाना चाहते थे, पर भेज दिया शहर की आबोहवा का ध्यान रखने वाले विभाग में। विभाग भी ऐसा, जहां न किसी की आवाजाही और न कार्रवाई। बजट में ही मन लगाते, तो पुरानी जगह की तुलना में नई जगह सिर्फ 10 फीसद बजट मिला। अब साहब का मूड खराब न हो, तो क्या हो। खैर खुद को सांत्वना देकर गोटियां जमाने की रणनीति बना रहे थे, तब तक विभाग बंद करने का भी ऐलान हो गया। अब तो साहब झल्ला गए। पर करते क्या, सो दिमाग को ठंडा किया और मुख्यमंत्री को साधने में जुट गए हैं। वे आए दिन मुख्यमंत्री के आजू-बाजू फोटो खिंचाते दिख जाएंगे। वरिष्ठों के सामने अपनी बात रखने में तेज साहब किसी भी दिन मुख्यमंत्री से अभयदान पा सकते हैं। क्योंकि उनकी सोच है जहां नहीं चैना, वहां नहीं रहना।

Posted By: Ravindra Soni

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