Naidunia Mohd. Rafique Column: मोहम्‍मद रफीक, भोपाल। भ्रष्टाचारियों की जांच-परख के लिए प्रदेश की प्रमुख जांच एजेंसी में हालचाल ठीक नहीं हैं। पहले एक कर्मचारी ने परेशान होकर जान देने का प्रयास किया। उसके ऐसे कदम को सही नहीं ठहरा सकते। पुलिस ने भी प्रकरण दर्ज कर लिया, लेकिन इससे ऐसी बातें उजागर हो गईं जो अभी तक होठों में दबी रहती थी। विभागीय स्तर पर हड़कंप मचा देने वाले घटनाक्रम के बाद अधिकारियों के बोलचाल का लहजा बदल गया है। मेलजोल को लेकर कुछ-कुछ होता, इससे पहले एक और समस्या आ गई। बात नहीं सुनने की शिकायत आम हो गई और वहां तक पहुंच गई, जहां उसे नहीं जाना था। हर विभाग की तरह यहां भी ऐसे अधिकारी हैं, जिनका ध्यान काम में रहता है। वे हालात बदलने से परेशान हैं। संबंध सामान्य करने में दो मीठे बोल बोले तो कुछ लोगों का मगज घूम गया। कोई कुछ कहे तो कान सुनते ही नहीं हैं।

सिर पर टोपी सवार

सिर मुंडाते ही ओले पड़ने वाली कहावत तो ठीक है, मगर यह अजीब बात है कि कुर्सी पर बैठते ही टोपी सिर पर आ जाए। मिलने-जुलने में सहज-सरल माने जाने वाले अधिकारी ने कुर्सी संभाली तो टोपियों की पुरानी खरीद ने दिक्कत पैदा कर दी। लोकायुक्त संगठन की पूछपरख में पुलिस के मुखिया भी शामिल हैं। जब इस स्तर पर जवाब तलब किए जा रहे थे तो सवालों को खंगालने के लिए मशक्कत करनी पड़ी। खेल पुराना था तो फाइलों की धूल झाड़ने में मातहत हांफने लगे। खैर, जवाब पेश हो गए। विभागीय मामला था, इसलिए कदम भी संभलकर रखे। अब गेंद नतीजे की बाउंड्रीलाइन पर है और जिम्मेदार परेशान हैं कि इसके साथ वे भी बाउंड्रीपार न हो जाएं। छोटे कर्मचारी तो उस वक्त भी थे, आज भी हैं। डर इस बात का है कि कुछ शब्द लिखने या आंकड़ों का आदेश मानने का ठीकरा उन पर न फूट जाए।

दिल्ली चलो की जिद

राजनीतिक उठापटक के हर दौर में दिल्ली चलो का नारा सिर चढ़कर बोलता है। पुलिस मुख्यालय के एक अधिकारी का दिल भी आजकल दिल्ली दौरे को लेकर काफी व्यस्त है। एक बड़े मामले की सुई तो मध्य प्रदेश में है, लेकिन उसकी चुभन दिल्ली से हो रही है। एक बार तो कुछ कारणों से सुबूत खाली हाथ रह गए, लेकिन वे जानते हैं कि हर बार ऐसा नहीं होगा। दिल्ली में रह रहे परिचितों के माध्यम से परिचय निकाला जा रहा है। यदि परिचय काम कर गया और सबूत में कुछ नहीं मिला तो फिर बात उनके पाले में होगी। वैसे ये महाशय बच निकलने में माहिर हैं। पहले भी जिन लोगों ने इन्हें फंसाने की ताल ठोकी थी, उन्हें ही सूटकेस में बंद कर दिया गया। अब काले का सफेद करने का मामला है तो उन्हें यकीन है कि जिनके लिए किया, वे साथ रहेंगे और बचाकर ले जाएंगे।

दिल भरा-भरा सा है

ये मेरे शेर, मेरे आखिरी नजराने हैं...। जाने वालों की मनस्थिति कुछ इसी तरह की होती है। बड़े साहब मन लगाकर काम में जुटे थे, लेकिन जबसे उनके जाने और नए के आने के तराने गूंजने लगे, तबसे उनसे जुड़े लोग कुछ असहज हैं। माना कि अभी काफी वक्त है, लेकिन दिल का क्या करें जो हर सवाल पर लगभग टूट सा जाता है। नौकरी करते-करते व्यक्तिगत रिश्ते तो बन ही जाते हैं। केबिन के बाहर इन रिश्तों की चांदनी में चार चांद लगाने वाले थोड़े अनमने हैं। साहब के जाने की भूमिका बाजार में आने की खबरों के शब्द नश्तर की तरह चुभ रहे हैं। उनके करीबियों से वे कुछ-कुछ और बहुत कुछ काम जल्दी करवाने का तगादा लगा रहे हैं। यह काम प्रदेशभर से आने हैं, इसलिए बार-बार वाट्सएप काल कर रहे हैं या आ रहे हैं। काम बहुत व्यक्तिगत हैं, इसलिए फोन पर सीधी बात नहीं करते।

Posted By: Ravindra Soni

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