Naidunia Mohd. Rafique Column: मोहम्‍मद रफीक, भोपाल। जिनके नाम से भ्रष्टाचारी खौफ खाते हैं, आजकल वे कुछ अनमने हैं। यह अनमनापन कामकाज को लेकर नहीं, बल्कि उन पर उठे सवाल को लेकर है। हाल ही में राजनीतिक मैदान में एक जांच एजेंसी को लेकर ऐसा कुछ कहा गया कि बात अखर गई। इस बारे में पूछो तो ऐसा लगता है मानो दुम पर पैर रख दिया हो। सारे काम पीछे करते हुए वे यह जतलाने में जुट जाते हैं कि वे बेचारे काम के मारे हैं। इस बारे में बात होने की भनक लगते ही जितनों को फुर्सत होती है, वे भी चले आते हैं। तब तक नहीं छोड़ा जाता, जब तक सामने वाला उनके हक में गवाही न दे। यह और बात है कि जिन दो-चार से जबर्दस्ती पक्ष में गवाही दिलवाई, वे खुद फंसे हैं। बाद में उनसे कुछ ऐसी बात कह दी जाती है कि अगला बाहर आकर अपनी गवाही से मुकर जाता है।

जीवन चलने का नाम...

कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो...। अनगिनत बार पढ़ा और सुना गया यह शेर उस हौसले का नेतृत्व करता है, जो मुश्किलों को चुनौती देता है। पुलिस मुख्यालय में इन दिनों एक महिला पुलिस अधिकारी के जज्बे की चर्चा है। झाबुआ जिले के पेटलावद में जन्मी ज्योति ठाकुर ने बेहद विपरीत परिस्थितियों के बीच अपने लिए सम्मानजनक स्थान बनाया। वे भोपाल रेंज में पुलिस अधीक्षक (अजाक) हैं। मौजूं यह है कि उनकी लिखी किताब का विमोचन होना है। इसमें देशभर की चुनिंदा महिला पुलिस अधिकारियों के संघर्ष की कहानी शामिल की गई है। किरण बेदी से लेकर प्रदेश की पहली महिला आइपीएस अधिकारी की भी बात होगी। पुलिस मुख्यालय में इस पर चर्चा इसलिए भी है, क्योंकि कई अधिकारी लेखन में रुचि रखते हैं। इसी बहाने ज्योति ठाकुर के संघर्ष और जीत पर बात हो रही है।

कुछ मीठा हो जाए

मौसम त्योहारी है तो कुछ मीठा हो जाए की डिमांड वाजिब हो जाती है। विजयदशमी से लगी लंबी छुट्टी का पुलिस मुख्यालय के कुछ अधिकारियों ने फायदा उठाया और एक दो दिन एडजस्ट कर लंबी सैर पर निकल गए। उन्होंने जिनसे मुंह मीठा कराने का तकादा किया था, उनमें से कुछ भोपाल आए और साहब के नहीं होने पर लौट गए। साहब से बात हुई तो कहा-हम तो आए थे, आप ही नहीं थे। जब यह बात आम हुई तो जो आए ही नहीं थे, उन्होंने भी आने का दांव चल दिया। मिठाई के शौकीन ऐसे तीन से चार साहब हैं। साहबों को मीठे में मिलावट का अंदाजा हो गया तो उन्होंने बात दीपावली तक मुलतवी कर दी है। अब मिठाई के डिब्बे के साथ दीपावली पर आने का न्‍यौता दिया है। अब मिठाई के डिब्बे का आशय बहुत समझाने वाली बात थोड़ी है, बाकी भी समझ-बूझ गए हैं।

नाम ही न आए तो अच्छा है

सरकारी नौकरी के मजे की सूची काफी लंबी होती है। काम करें या न करें, काम तो हो ही जाता है। कुछ तो ऐसे हैं, जिन्हें अपना अच्छा काम भी पता नहीं है। दरअसल वे चाहते ही नहीं कि उनके अच्छे काम की भी तारीफ हो। वजह बिलकुल साफ है कि गलती से हुए अच्छे काम की तारीफ हुई तो नजर में आएंगे और फिर आराम की जगह काम करना पड़ेगा। अच्छा यही है कि नाम ही न आए। किसी को यह भी पता न चले कि उनकी केबिन पुलिस मुख्यालय के किस हिस्से में है। ये ऐसे अधिकारी हैं, जो चांद के दाग भी गिनकर बता देते हैं। काम नहीं हो तो दिनभर ऐसी चकल्लस चलती रहती है। भड़ास निकालने वाली ऐसी जमात का पूरा ग्रुप बना हुआ है। उनकीकेबिन में काम तो नहीं के बराबर है, हां दूसरों की गलतियों और सिस्टम की खामियों पर दिनभर बात होती है।

Posted By: Ravindra Soni

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