Naidunia Mohd. Rafique Column: मोहम्‍मद रफीक, भोपाल। कोरोना पीड़ितों की मदद के लिए आइपीएस अधिकारियों ने एक दिन का वेतन दान किया तो खूब सराहना मिली। तारीफ में खबरें भी छपीं। इस नेक काम में अब एक दिक्कत आ रही है। दान देने वाले कुछ अधिकारियों का कहना है कि इसमें आयकर की छूट मिलनी चाहिए। एसोसिएशन की ओर से राशि दान की गई तो छूट अधिकारियों को मिलेगी नहीं। मामला बड़े स्तर का है और कुछ बोलने की मनाही है, इसलिए आपसी चर्चा में ही इस प्रक्रिया का विरोध किया जा रहा है। जो लोग विरोध कर रहे हैं, उनका तर्क भी वाजिब है कि किसी सामाजिक उद्देश्य के लिए किए गए दान पर नियमपूर्वक मिलने वाली छूट की व्यवस्था की जानी चाहिए। दरअसल बात एक दिन का वेतन देने की नहीं, उस सम्मान की है जिसमें सब हिस्सेदार हैं। इन्हें उम्मीद है कि बात हो रही है तो अगली बार व्यवस्था में सुधार आ जाए।

इंटरनेट मीडिया पर धमाल

इंटरनेट मीडिया का दौर है तो ऐसे में पुलिस भला क्यों पीछे रहे। पुलिस की सभी शाखाओं और जिला स्तर पर भी इस माध्यम को प्रचार-प्रसार के लिए मुफीद माना जा रहा है। जिले के अधिकारियों को भी इस संबंध में आदेश-निर्देश दे दिए गए हैं। पुलिस महानिदेशक के टि्वटर हैंडल को भी चाक-चौबंद कर दिया गया है। बीते कुछ दिनों से बड़े साहब का टि्वटर हैंडल मुस्तैद हो गया है। जिनके जिम्मे इस टि्वटर हैंडल से सूचनाओं की परेड निकालना है, वे साहित्यिक शब्दों की खोजबीन में लगे हैं। साहब के प्रचार-प्रसार का काम देखने वाले हर घटना पर नजर रख रहे हैं और अच्छी खबर आते ही बधाई और शुभकामनाएं टाइप करने में जुट जाते हैं। साहब की मंजूरी के बाद ट्वीट होता है। जिसकी तारीफ होती है, उसकी पूरे महकमे में बल्ले-बल्ले हो जाती है। व्यवस्था का उद्देश्य विभागीय कार्यप्रणाली में प्रोत्साहन देने की नीति को बढ़ाना है।

सहारे वाले भी तलाश रहे सहारा

पुलिस मुख्यालय में तबादलों का दौर शबाब पर है। हर दिन थोक में तबादला सूची जारी की जा रही है। अधिकारी तो ज्यादा सुनते नहीं, लेकिन उनके दाएं-बाएं वालों के फोन रात भर बज रहे हैं। मजेदार बात यह हो रही है कि जिन लोगों से जिले वाले तबादलों की गुहार लगा रहे हैं, वे खुद ही फील्ड पोस्टिंग की जुगाड़ में भटक रहे हैं। उनकी मंशा यह है कि किसी भी जिले में चले जाएं, ताकि सूखा खत्म हो। जिनके भरोसे बाहर के लोग कुछ होने की उम्मीद में हैं, वे ही मुख्यालय में सहारे का सुराग तलाश रहे हैं। मुख्यालय के ऐसे अधिकारी, जिनके पास इसकी ताकत है वे मंशा भांप रहे हैं। फाइल लाने के बहाने अपनी बात कहने के लिए लोग घंटों इंतजार कर रहे हैं। साहब के दरवाजे के बाहर बैठने वाला हर बार घंटी बजने के बाद बाहर आकर मूड की जानकारी दे रहा है।

ई-एफआइआर की तारीफ पर तारीफ

अपराधिक गतिविधियों का हिसाब रखने वाले स्टेट क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के लोग इन दिनों चर्चा में हैं। ई-एफआइआर जैसा प्रयोग सफल हो गया है। अब इसकी निगरानी और सख्त कर दी गई है। शाखा के ज्यादातर अधिकारी इसे व्यक्तिगत सफलता के तौर पर ले रहे हैं और अपनी ओर से प्रयास कर रहे हैं कि ज्यादा से ज्यादा ई-एफआइआर दर्ज हो। इस माध्यम से लोगों के अनुभव संकलित करने की तैयारी भी की जा रही है। थाने जाकर रिपोर्ट लिखवाने की दुश्वारियां खत्म होने पर बड़े साहब की वाहवाही भी अधिकारियों को मिल रही है। अब नए टास्क पर भी मंथन शुरू हो गया है। ई-एफआइआर में नए फीचर जोड़ने के लिए विषयों की तलाश की जा रही है। नए फीचर के अच्छे-बुरे पक्षों पर बहस की जा रही है। व्यवस्था में तकनीकी सुधार का लाभ यह है कि हर एफआइआर की जानकारी पुलिस मुख्यालय को तत्काल मिल रही है।

Posted By: Ravindra Soni

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