Naidunia Mohd. Rafique Column: मोहम्‍मद रफीक, भोपाल। कहने-सुनने में बात जरा अजीब लग सकती है कि पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों को मैदान में जाने से डर लग रहा है। डर को यदि हिचक कहें तो ज्यादा सटीक होगा। पुलिस मुख्यालय के आला अधिकारी कुछ दिन पहले तक मैदान में जाने के लिए जोड़-तोड़ कर रहे थे, लेकिन अब कुछ दिन मुख्यालय में गुजारने की नीति पर चल रहे हैं। बीते दिनों जिला मुख्यालयों पर ऐसी घटनाएं घटीं कि जवाबदेही वरिष्ठों पर आ गई। अभी उपचुनाव का माहौल है और फिर चुनावी गर्मा-गर्मी शुरू हो जाएगी। मतलब एक-दो साल राजनीतिक हालात के मद्देनजर बात कही और सुनी जाएगी। जाहिर है, नतीजों को लेकर राजनीतिक तराजू पर भी सक्रियता और कर्मठता का तोल-मोल होगा। ऐसे में अधिकारी कहते पाए जाते हैं कि चुपचाप नौकरी करो। दरअसल, हाल ही में खरगोन में एक आदिवासी युवक की मौत के बाद खरगोन के पुलिस अधीक्षक शैलेंद्र सिंह चौहान को हटा दिया गया था।

किसी के अच्छे दिन गए, कोई इंतजार में

सरकारी दफ्तरों में बिना लिए-दिए काम नहीं करने वालों के दिन अच्छे नहीं चल रहे हैं। उनके लिए आजकल मौसम बड़ा बेईमान चल रहा है। कोरोना संकट में फुर्सत में बैठी जांच एजेंसियों के कर्ताधर्ताओं ने हाथ-पैरों की धूल झाड़ ली है। शिकायत करने के लिए लोगों को प्रेरित करने के लिए जो प्रयास किए गए, वह रंग ला रहे हैं। रिश्वत की राशि से जेब बड़ी करने वालों को सरेआम धरा जा रहा है। इससे शिकायत करने वाला तो खुश है ही, जांच एजेंसी के कर्मचारी और अधिकारी भी मजे में हैं। यह मजा दो किस्म का है। पहला यह कि काम करने का मौका मिल गया है। बहुत दिन से खाली बैठे रहने से रसूख कम हो रहा था। दूसरा जरा दबा-छुपा है। जब रसूख बोलेगा तो कुछ और भी होगा। यह कुछ और क्या है- समझने के लिए इशारा ही काफी है।

नींव के पत्थर का दर्द

साइबर के क्षेत्र में दुनियाभर के जानकारों को जमा कर मध्य प्रदेश पुलिस ने अपनी पहचान अलग कर ली है। सौभाग्य से यहां कुछ अफसर ऐसे हैं, जिन्होंने व्यक्तिगत प्रयास कर इस क्षेत्र में अपनी दक्षता बढ़ाई है। अब साइबर के जानकारों के तौर पर मध्य प्रदेश को जाना-पहचाना जा रहा है। इससे जांच करने में मददगार लोगों से व्यक्तिगत परिचय भी हो गया। यह पहचान बनाने में वर्षों लगे, लेकिन अब मामला फिट हो गया तो नाम होने की भी चिंता है। किस अखबार में कितना छपा, किसके बारे में क्या लिखा, इसकी खोज-खबर ली जा रही है। अंदरखाने यह भी खबर है कि श्रेय लेने में कुछ ऐसे लोग आगे निकल गए, जो पहले कहीं दिखते नहीं थे। कहा जा रहा है- नींव का पत्थर नाज करे तो बात समझ में आती है, कंगूरे क्या नाज करें, वो तो दीवारों पर जिंदा हैं।

आज कुछ मीठा हो जाए

होम गार्ड के जवानों के दिन फिरेंगे या नहीं यह तो वक्त बताएगा, लेकिन यह जमात इस बात से खुश है कि उनकी बात होने लगी है। सर्विस ब्रेक जैसे बड़े मामले पर उन्हें राहत देने की चर्चा चल रही है। हमेशा आर्थिक संकट और दोयम दर्जे के व्यवहार से दुखी रहने वाले यह जवान आजकल बात-बात पर मुंह मीठा कराने की बात कहने लगे हैं। कोई मीठा खिलाए या नहीं, लेकिन खुशखबरी की बात सुन सीना चौड़ा हो जाता है। इन जवानों के जो ठीये आबाद रहते हैं, वहां का जुमला बन गया है कि आज किस बात पर मुंह मीठा कराया जा रहा है। जवान भी घोषणाओं से छन-छनकर आने वाली खबरों की समीक्षा कर नतीजे निकाल रहे हैं। कुछ जानकार नौकरी के दिन-साल के गुणा-भाग के विशेषज्ञ बने हुए हैं।

Posted By: Ravindra Soni

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