Navratri 2022: भोपाल, नवदुनिया प्रतिनिधि। भोपाल से 25 से 30 किलोमीटर दूर रायसेन रोड के नजदीक स्थित कंकाली मंदिर में श्रदधालुओं की अपार आस्था है। इस मंदिर में स्थापित मां काली की मूर्ति की गर्दन 45 डिग्री झुकी हुई है। यहां शारदीय नवरात्र में भक्तों की भीड़ उमड़ रही है। सुबह चार बजे से मां कंकाली का श्रृंगाार किया जाता है। श्रद्धालुओं के लिए सुबह छह बजे से मंदिर खोल दिया जाता है। नवरात्र के चलते मंदिर में भोपाल, रायसेन, सीहोर, विदिशा सहित आसपास के गांवों से लोग बड़ी संख्या में मां कंकाली के दर्शन करने पहुंच रहे हैं।

मंदिर का इतिहास

कंकाली माता का मंदिर रायसेन जिले के गुदावल गांव में आता है। ऐसा दावा किया जाता है कि यहां मां काली की देश की पहली ऐसी मूर्ति है, जिसकी गर्दन 45 डिग्री झुकी हुई है। मंदिर की स्थापना 1731 के आस-पास मानी जाती है। बताया जाता है कि खोदाई के दौरान यह मूर्ति मिली थी। हालांकि मंदिर कब अस्तित्व में आया, सही तिथि का कोई प्रमाण नहीं मिलता है। वर्तमान में इस मंदिर को नया भव्य स्वरूप दिया जा रहा है। परिसर में धर्मशाला, गौशाला, संस्कृत विद्यालय आदि स्थापित किए जा रहे हैं।

नवरात्र में मां काली की गर्दन होती है सीधी

कहा जाता है कि देवी मां की मूर्ति की गर्दन तिरछी है और वो नवरात्र में अचानक सीधी हो जाती है। यह चमत्कार देखने के लिए बड़ी संख्या में भक्त इस स्थान पर पहुंचते हैं। मान्यता है कि जो भक्त नवरात्र के दौरान माता की गर्दन को सीधा होते हुए देख लेता है, उसके सभी बिगड़े काम पूरे हो जाते हैं।

भगवान ब्रह्मा, विष्णु व महेश भी विराजे

मंदिर में मां काली की मूर्ति स्थापित है। यह मां काली का प्रचीन मंदिर है। यहां मां काली की 20 भुजाओं वाली मूर्ति के साथ भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश की प्रतिमाएं विराजमान हैं। यूं तो यहां वर्षभर ही दूर-दूर से भक्त आते हैं। वहीं शारदीय व चैत्र नवरात्र में मंदिर में भक्तों का तांता लग जाता है। हरे-भरे जंगलों के बीच स्थापित मंदिर लोगों को अपनी ओर खींच लाता है। मां काली के दर्शन के साथ ही लोग हरियाली का आनंद उठाते हैं। वर्षा के समय पूरा इलाका हरा-भरा लगता है।

मनोकामना होती है पूरी

नवरात्र व सामान्य दिनों में भक्त यहां बंधन बांधकर मनोकामना मांगते हैं। भक्तों की मनोकामना पूरी भी होती है। भक्त मनोकामना मांगने मां काली के दरबार में आते हैं। मनोकामना पूरी होने पर बंधन खोलने भी आते हैं। नि:संतान दंपत्तियों की यहां गोद भर जाती है। महिलाएं यहां उल्टे हाथ से गोबर लगाती हैं। मनोमानाएं पूरी होने पर सीधे हाथ का निशान बनाती हैं। -भुवनेश शास्त्री, मंदिर के पुजारी

Posted By: Ravindra Soni

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