भोपाल, नवदुनिया प्रतिनिधि। भोपाल समेत छह अन्य स्टेशनों की तरह और भी नौ स्टेशनों पर ट्रेनों के गुजरते ही लाइटें स्वत: बंद हो जाती है। इसी तरह इन स्टेशनों पर जब ट्रेनें प्रवेश करने वाली होती हैं, तो 100 प्रतिशत लाइटें स्वत: चालू भी हो जाती है। इन स्टेशनों पर सिग्नल आधारित आधुनिक तकनीक का उपयोग करते हुए यह स्वचालित सिस्टम लगा दिए गए हैं, जो बिजली बचाने के मकसद को पूरा कर रहे हैं। इसकी शुरूआत विदिशा स्टेशन से की गई थी। जिसे पुरस्कृत किया जा चुका है। इसका विस्तार मंडल के सभी 96 स्टेशनों तक किया जाना हैं। भोपाल मंडल के भोपाल, रानी कमलापति, विदिशा, इटारसी, बीना, नर्मदापुरम स्टेशन पर यह सिस्टम पूर्व में ही लगा दिया गया था। अब गुना, शिवपुरी, हरदा, संत हिरदाराम नगर, गंज बासौदा, सांची, अशोक नगर, ब्यावरा, राजगढ़ में भी इसे लागू कर दिया है। इन स्टेशनों के कुल 33 प्लेटफार्मों को कवर किया गया है।

इस तरह पश्चिम मध्य रेलवे की बात करें तो 40 स्टेशनों पर ये सिस्टम लगा दिए गए हैं, जो 96 प्लेटफार्मों को कवर कर रहे हैं। इस तरह अब तक रेलवे को 36 लाख यूनिट बिजली की बचत हुई है।

पूर्व में ये लाइट्स चौबीसों घंटे जलती थीं, जिसकी वजह से 36 लाख यूनिट बिजली वर्ष भर में अतिरिक्त खर्च होती थी। इस बिजली में बड़ा हिस्सा कोयला से उत्पादित हुई बिजली का होता था। कोयला आधारित कारखाना पर्यावरण व इंसानों के लिए गंभीर चुनौती बने हुए हैं। रेलवे ने इस तरह के सिस्टम को अपनाकर कोयला आधारित बिजली की जरूरत को कम करने की दिशा में बेहतर प्रयास किए हैं।

पश्चिम मध्य रेलवे के जीएम सुधीर कुमार गुप्ता का कहना है कि रेलवे लगातार ऊर्जा बचाने की दिशा में काम कर रहा है। इसका नतीजा है कि बिजली बचाने के लिए नई-नई तकनीक ला रहे हैं। इस सिस्टम को जोन के सभी स्टेशनों पर अमल में लाने की दिशा में तेजी से काम किया जा रहा है। इतना ही नहीं, रेलवे इंजनों से पहले ही बिजली बनाने की शुरूआत कर चुका है, जो कि सीधे नेशनल ग्रिड में दी जाती है और यही बिजली ट्रेनों के संचालन व प्लेटफार्मों पर उपयोग की जाती है।

भोपाल रेल मंडल के डीआरएम सौरभ बंदोपाध्याय का कहना है कि कोयला आधारित बिजली की खपत कम करने की दिशा में रेलवे जुटा हुआ है। बीना सोलर प्लांट इसका ताजा उदाहरण है। यहां से ट्रेनों के संचालन के लिए बिजली पैदा की जा रही है। इसके अलावा भोपाल, रानी कमलापति, बीना, इटारसी जैसे तमाम स्टेशनों के शेड की छतों पर सोलर पैनल लगाए हैं, जहां जरूरत की काफी बिजली पैदा की जा रही है। छूटे हुए स्टेशनों को भी इसके दायरे में लाया जाएगा।

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