भोपाल, नवदुनिया प्रतिनिधि। हर साल तेज ठंड और कोहरे के समय ट्रेनें घंटों देरी से आती हैं। इस वर्ष ऐसा न हो, इसके लिए रेलवे ने व्यापक स्तर पर तैयारियां की हैं। इंजनों में फाग सेफ डिवाइसें लगा दी हैं। सिग्नलों की पुरानी लाइट बदल दी गई हैं, ताकि इनकी दृश्‍यता बढ़ जाए। सिग्नलों के आसपास से झाड़ियों को काट दिया है। घने कोहरे में ट्रेनों को चलाने के लिए सैटेलाइट की भी मदद ली जाएगी। भोपाल से 150 ट्रेनें चौबीस घंटे में गुजरती हैं। इनमें 132 ट्रेनें भोपाल में ठहराव लेकर चलती हैं। उत्तर भारत की तरफ से आने वाली कुल ट्रेनों में से 50 फीसद ट्रेनें ठंड के दिनों में देरी से आती हैं। ये ट्रेनें देरी से न आएं, इसके लिए रेलवे विशेष प्रयास कर रहा है। बीना से भोपाल और भोपाल से इटारसी के बीच तीसरी रेल लाइन से भी ट्रेनों को समय पर चलाने में मदद मिल रही है।

बीते वर्ष पटरी पर इक्का-दुक्का ट्रेनें थी, इसलिए नहीं दिखा असर

बीते वर्ष कोरोना संक्रमण के चलते पटरी पर इक्का-दुक्का ट्रेनें ही दौड़ रही थीं। इसके कारण ज्यादा असर नहीं दिखा। वैसे हर वर्ष ठंड के दिनों में दिल्ली समेत उत्तर भारत के स्टेशनों से आने वाली ट्रेनें आठ से दस घंटे तक देरी से भोपाल व रानी कमलापति रेलवे स्टेशन पहुंचती थीं। यात्रियों को परेशान होना पड़ता था।

ट्रेनों के देरी से आने के कारण प्रभावित होती हैं बाकी ट्रेनें

सभी ट्रेनों का अपना समय होता है। यदि उस समय में जरा भी फेरबदल व देरी होती है तो इसका असर उस रेलमार्ग पर चलने वाली सभी ट्रेनों पर पड़ता है। ऐसी स्थिति में रेलवे के लिए ट्रेनों को समय पर चलाने में दिक्कतें होती हैं। बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।

ठंड में यात्रियों की बढ़ जाती हैं मुश्‍किलें

बीते वर्षों में कड़ाके की ठंड के दौरान गोरखपुर से आने वाली कुशीनगर, अमृतसर से आने वाली सचखंड समेत अन्य ट्रेनें 10 से 12 घंटे की देरी से भोपाल पहुंचती रही हैं। ट्रेनों के इस तरह देरी से पहुंचने के कारण आम यात्रियों को घंटों स्टेशनों पर ठंड में इंतजार करना पड़ता है। इसके अलावा जो यात्री ट्रेन में सफर करते हैं उन्हें भी दिक्कतें होती हैं। इन सभी मुश्किलों को देखते हुए रेलवे बोर्ड इस बार कोशिशें कर रहा है कि कोई भी ट्रेन देरी से न चले।

Posted By: Ravindra Soni

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