-भक्तिभाव से 64 रिद्धि महामंडल विधान के अर्घ्य समर्पित

भोपाल। नवदुनिया प्रतिनिधि

जीव अकेला ही कर्म करता है। अकेला ही कर्म फल भोगता है फिर भी अज्ञानी दशा में भोग विलास के कारण पापमय जीवन जी रहा है। यह विचार शुक्रवार को

मुनिश्री अरह सागर महाराज ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि इंद्रियों के सुखों को कोई नहीं भोग पाया। इन्द्रियों का दर्प आत्मा के आनंद को नाश कर देता है। अतिइन्द्रिय सुख को खा जाती हैं इन्द्रिओं का सम्राट मन है जो पहले कहता है धर्म करो फिर कहता है कर्म करो। इन्द्रियों के दास मत बनो जीवन में सुख-शांति का साधन है वीतराग विज्ञान। मुनिश्री ने आगे कहा कि आत्मा को परमात्मा बनाने की विधि चारित्र है।

रिद्धि महामंडल विधान का समापन

मुनि अरह सागर महाराज के सानिध्य में भक्तिभाव से 64 रिद्धि महामंडल विधान का समापन हुआ। प्रातः मूलनायक भगवान पार्श्वनाथ का अभिषेक इंद्रों द्वारा किया गया। जिनालय में विधान का भव्य और आकर्षक मांडना सजाया गया था। भक्ति के साथ संगीतमय स्वर लहरियों के द्वारा रचना जैन के मुखारबिंद से जैन भजनों की धुन पर भक्ति नृत्य किया। संगीतकार अतुल जैन एवं उनकी टीम ने वाद्य यंत्रों द्वारा संपूर्ण जिनालय में मौजूद श्रद्धालुओं को थिरकने पर मजबूर कर दिया। विधान के प्रमुख पात्रों द्वारा मंडल पर अष्ट द्रव्यों का थाल सजाकर अर्घ्य समर्पित किए गए। प्रवेनद्र भैया के निर्देशन में धार्मिक अनुष्ठान विधि-विधान से संपन्न हुए।