भोपाल(नरि)। हमारा इतिहास, विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में अत्यंत संपन्ना रहा है, किंतु विवरणात्मक विज्ञान की हमारी परंपरा खत्म होने और डार्विन के विकासवाद का सिद्घांत दिमाग पर हावी हुआ और हम विज्ञान के क्षेत्र में पिछड़ गए । ज्ञान परंपरा लुप्त होने से आयातित ज्ञान को आयातित भाषा से प्राप्त करना हमारी गलती रही, शब्द को दृश्य में बदलने और प्रसार माध्यमों में विज्ञान साहित्य का स्थान सिकुड़ने से भी समस्या बढ़ी। यह बात रवींद्रनाथ टैगौर विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डॉ. संतोष चौबे ने मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, हिंदी भवन द्वारा आयोजित हिंदी भाषा एवं साहित्य उत्सव में 'हिंदी में विज्ञान साहित्य' विषय पर कही। उन्होंने कहा कि हम अगर अपनी भाषा व परिवेश को जानते हैं और दृढ़ इच्छा शक्ति हो तो प्रगति के नए सोपान प्राप्त कर सकते हैं। परिसंवाद के प्रारंभ में हिंदी भवन के निदेशक डॉ. जवाहर कर्नावट ने सभी का स्वागत किया। होमी भाभा विज्ञान शिक्षा केंद्र, मुंबई के प्राध्यापक डॉ. कृष्णकुमार मिश्र ने कहा कि विज्ञान साहित्य में दस हजार से अधिक पुस्तकें उपलब्ध हैं और 15 सौ से अधिक विज्ञान विषयक लेखक भी सक्रिय हैं। हमें इन पुस्तकों का प्रचार-प्रसार करने की आवश्यकता है। विश्वविद्यालयों में विज्ञान शिक्षा का माध्यम हिंदी व भारतीय भाषाओं को बनाए जाने पर ही इस विज्ञान साहित्य का उपयोग हो सकता है। इस मौके पर विज्ञान लेखक एवं पत्रकार प्रमोद भार्गव ने भी अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम का संचालन मप्र माध्यम के प्रधान संपादक पुष्पेंद्रपाल सिंह ने किया

Posted By: Nai Dunia News Network

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