भोपाल से शशिकांत तिवारी। मध्य प्रदेश में डॉक्टरों की नई पौध को भी ग्रामीण क्षेत्रों या छोटे कस्बों में डॉक्टरी करना पसंद नहीं आ रहा है। स्थायी सेवा तो छोड़ दीजिए, एमबीबीएस व पीजी के बाद एक-एक साल के अनिवार्य ग्रामीण सेवा बांड के तहत भी डॉक्टर यहां के अस्पतालों में जाने को तैयार नहीं हैं। वे इसके बाद बदले लाखों रुपए बांड राशि जमा कर रहे हैं। हाल में मेडिकल कॉलेजों से एमबीबीएस-पीजी कर निकले डॉक्टरों को ग्रामीण सेवा के लिए नोटिस दिया गया तो 204 डॉक्टरों ने वहां जाने के बदले कुल करीब पांच करोड़ रुपए जमा कर दिए। मप्र लोक सेवा आयोग से डॉक्टरों की स्थायी भर्ती की जा रही है, नेशनल हेल्थ मिशन (एनएचएम) से संविदा भर्तियां चल रही हैं, डॉक्टरों को ग्रामीण क्षेत्रों में नौकरी के लिए सेवा शर्तें भी बेहतर की जा रही हैं। इसके बावजूद गांव- कस्बों के अस्पतालों में डॉक्टर कम होते जा रहे हैं। इस पर विचार इसलिए भी जरूरी है क्योंकि विभिन्न योजनाओं की बदौलत अस्पतालों में बाकी संसाधन बढ़ रहे हैं।

स्थिति चिंताजनक इसलिए भी है क्योंकि आबादी बढ़ रही है पर डॉक्टर कम होते जा रहे हैं। 2014 में प्रदेश में विशेषज्ञों के 1980 पद खाली थे। आज की स्थिति में 2738 पद खाली हैं। इसी तरह, 2014 में चिकित्सा अधिकारी के 1837 पद खाली थे। पांच साल बाद भी लगभग वही स्थिति है। इनके 1436 पद खाली हैं। सरकार अस्पतालों ने गंभीर व नई बीमारियों के लिए खास क्लीनिक व यूनिट बना रही है, पर डॉक्टरों की कमी के चलते मरीजों को पूरा फायदा नहीं मिल पा रहा है। अब डॉक्टरों की कमी को देखते हुए राज्य सरकार 'स्वास्थ्य का अधिकार' कानून बनाने जा रही है। सभी को इसके दायरे में लाने की तैयारी है। इसमें आयुष्मान योजना के तहत मरीजों का चिह्नित निजी या सरकारी अस्पतालों में इलाज कराया जाएगा।

बुरा असर : डॉक्टरों की कमी के चलते शिशुओं की सबसे ज्यादा मौत मध्य प्रदेश में

सभी जिला अस्पताल, सिविल अस्पताल व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में सीजर (ऑपरेशन से प्रसूति) की सुविधा होनी चाहिए। सरकारी अस्पतालों की संख्या करीब 400 है, पर 120 अस्पतालों में ही सीजर डिलीवरी हो पा रही है। यही वजह है कि हर राज्य में मातृ मृत्यु दर कम हो रही है, जबकि मध्य प्रदेश में बढ़ रही है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की पिछले हफ्ते आई 2015- 17 की रिपोर्ट में देश्ा में सबसे ज्यादा शिशु मृत्यु दर 47 प्रति हजार (0 से 1 साल तक) मध्य प्रदेश की है। मातृ मृत्यु दर भी अपेक्षाकृत बढ़ी है।

नाकाफी : जरूरत के एक तिहाई डॉक्टर ही मिल रहे

2010 में मेडिकल ऑफिसर्स के 1090 पदों के विरुद्ध 570 डॉक्टर ही मिले थे। इसके बाद करीब 200 डॉक्टर पीजी करने या फिर मनचाही पोस्टिंग नहीं मिलने पर नौकरी छोड़कर चले गए। 2013 में 1416 पदों पर भर्ती में 865 डॉक्टर मिले लेकिन करीब 200 ने ज्वाइन नहीं किया। 2015 में 1271 पदों की भर्ती में 874 डॉक्टर मिले लेकिन इनमें से भी 218 डॉक्टरों ने ज्वाइन नहीं किया। कुछ पीजी करने चले गए और कुछ ने नौकरी छोड़ दी। करीब 400 डॉक्टर ही मिल पाए। 2015 में ही 1871 पदों के लिए भर्ती शुरू हुई थी। 2017 में नियुक्ति आदेश जारी होने के बाद करीब आधे डॉक्टर ही मिले। हाल ही में बैकलॉग के 1065 पदों पर भर्ती की गई, इसमें 547 डॉक्टर मिले हैं। अब देखना यह है कि कितने डॉक्टर ज्वाइन करते हैं।

उम्मीद : तो हर साल मिलेंगे पांच हजार बांडेड डॉक्टर

2021 से निजी कॉलेजों से एमबीबीएस कर निकलने वाले डॉक्टरों को भी बंध पत्र (बांड) के तहत गांव जाना होगा। इस साल से प्रदेश में एमबीबीएस व बीडीएस की 1920 सीटें हो गई हैं। सीटें लगातार बढ़ रही हैं। सरकारी मेडिकल कॉलेजों में पीजी की 712 सीटें हैं। अगले साल बढ़कर 1364 होने की उम्मीद है। इस तरह एमबीबीएस व पीजी मिलाकर हर साल करीब पांच हजार डॉक्टर निकलेंगे। चिकित्सा शिक्षा मंत्री डॉ. विजयलक्ष्मी साधौ का कहना है कि मरीजों के हित में डॉक्टरों की ग्रामीण सेवा को अनिवार्य किया जाएगा। इसके लिए जल्द ही विधानसभा में मप्र आयुर्विज्ञान संशोधन विधेयक लाया जाएगा। जानकार बताते हैं कि छोटे शहरों में मेडिकल कॉलेज खुलने से भी गांवों के प्रति आकर्षण बढ़ सकता है बशर्ते सेवा शर्तें, सुविधाएं बेहतर हों।

Posted By: Prashant Pandey