लाट साहब : भाजपा का नारा सबका साथ, सबका विकास राजधानी में पूरा होते दिखाई दे रहा है। प्रदेश की भाजपा सरकार न केवल भाजपा नेताओं बल्कि कांग्रेस के नेताओं का भी भरपूर ख्याल रख रही है, ताकि कांग्रेस नेताओं की भी रोजी-रोटी चलती रहे। आलम यह है कि एक अप्रैल से प्रदेशभर में गेहूं की ख्ररीदी होने वाली है। इस गेहूं की खरीदी में पहली बार एक प्रयोग किया गया है कि किसान सीधे वेयर हाउस में जाकर अपना गेहूं बेच सकते हैं। इसके लिए वेयर हाउस संचालक से अनुबंध भी किया गया है। खास बात यह है कि पहली बार जिस वेयर हाउस का अनुबंध किया गया है, वह राजधानी के ग्रामीण क्षेत्र के कांग्रेस अध्यक्ष का है। उनके वेयर हाउस से ही गेहूं की खरीदी की जाएगी। हालांकि यह पहली बार नहीं हो रहा है। पहले भी कांग्रेस के जिला अध्यक्ष के कई काम भाजपा सरकार ने कराए हैं।

सेवानिवृत्ति की है तैयारी

राजधानी के एक अफसर ऐसे हैं, जो 31 अक्टूबर को सेवानिवृत्त होने वाले हैं। इस सेवानिवृत्ति से पहले साहब खूब दम लगा रहे हैं। एक नया अफसर जिस तरह से रात-दिन मेहनत में जुटा रहता है, उसी तरह ये साहब भी अपना तन-मन-धन सब छोड़कर अफसरगीरी में लगे हैं। साहब सिर्फ बैठक नहीं कर रहे हैं, बल्कि बैठकों का पूरा दौर चला रहे हैं। अब तक तो वरिष्ठ अधिकारी द्वारा कनिष्ठ अफसरों की बैठक लेने के बारे में आपने भी सुना होगा, लेकिन ये साहब तो कम्प्यूटर ऑपरेटर और एसडीएम, तहसीलदार के रीडर तक की बैठक लेने से नहीं चूक रहे हैं। मामला तो यहां तक पहुंच गया है कि रीडरों की बैठक में भी वही निर्देश दिए जा रहे हैं, जो निर्देश अधिकारियों को दिए जाते हैं। अनसुलझे सवाल यह हैं कि ऑपरेटर और रीडर की बैठक लेकर साहब किसे लुभाने की तैयारी कर रहे हैं।

कार्रवाई या खानापूर्ति

ग्रामीण क्षेत्रों में कार्रवाई करने के अधिकार बड़े साहब ने संबंधित क्षेत्र के एसडीएम को सौंप दिए हैं। बावजूद इसके अब तक शहर में एक भी एफआइआर ग्रामीण क्षेत्रों में नहीं हो पाई है। चाहे बात बैरसिया की हो या हुजूर की। कोलार में भी ग्रामीण क्षेत्र को छोड़कर शहरी क्षेत्र में एफआइआर दर्ज हो चुकी है। इधर, नगर निगम सीमा क्षेत्र में अब तक करीब 200 से ज्यादा अवैध कॉलोनियों पर एफआइआर दर्ज कराई जा चुकी है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में सिर्फ बाउंड्रीवाल, सड़क और विकास कार्य को तोड़कर ही इतिश्री हो रही है। हैरत की बात तो यह है कि किसी भी अवैध कॉलोनी काटने वाले के पास दस्तावेज नहीं हैं। बड़े साहब के बदले जिस अधिकारी ने सुनवाई की, वह आज तक एफआइआर दर्ज नहीं करा पाए। एफआइआर कराने में किस बात की देरी हो रही है, यह तो खुद अफसर ही जानते होंगे।

कोरोना बढ़ा तो याद आए पुराने अधिकारी

राजधानी में कोरोना का संक्रमण एक बार फिर तेजी से बढ़ता जा रहा है। इस बार कोरोना के मामलों पर अंकुश लगाने के लिए सिर्फ एक अफसर पर सारा बोझ आ गया है। कोरोना का जिलास्तरीय कंट्रोल रूम जो कलेक्ट्रेट कार्यालय में संचालित होता था, वह स्मार्ट सिटी भेज दिया गया है। इसके बाद से न तो कांटेक्ट ट्रेसिंग की जा रही है और न ही कंटेनमेंट क्षेत्रों की सतत निगरानी हो रही है। हैरत की बात तो यह है कि पॉजिटिव मरीजों की रिपोर्ट 24 घंटे के अंदर आनी चाहिए, लेकिन 48 से 72 घंटे तक रिपोर्ट नहीं आ पा रही है। यह सब देखकर अधीनस्थ अफसरों को अब पुराने अधिकारियों की याद आनी शुरू हो गई है, जब कोरोना के समय उन्होंने मिनट-टू-मिनट मॉनीटरिंग कर शहर में संक्रमण पर काबू पा लिया था। इन सभी अफसरों का स्थानांतरण अन्य जिलों में हो चुका है।

Posted By: Ravindra Soni

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