भोपाल (नवदुनिया प्रतिनिधि)। प्रभु श्रीराम का अवतार इस धरती को पापियों के पाप के बोझ से मुक्त करने एवं सज्जनों की रक्षा के लिए हुआ था। उनके बताए हुए मर्यादित मार्ग पर चलने वाले लोग अपने जीवन में हमेशा सफलता प्राप्त करते हैं।

यह उद्गार आचार्य चतुरनारायण शास्त्री ने लालघाटी क्षेत्र में स्थित गुफा मंदिर परिसर में चल रही श्रीराम कथा में व्यक्त किए। उन्होंने बताया कि पृथ्‍वीलोक में प्रभु श्रीराम के अवतरण के कई कारण हैं। उसमें एक खास कारण नारद श्राप भी है, जो स्वयं नारद ने बैकुंठवासी परमात्मा श्री विष्णु को दिया था। दरअसल, एक बार नारदजी के मन में इस बात का अहंकार आ गया कि उन्होंने काम के साथ क्रोध पर भी विजय प्राप्त कर ली है, जो स्वयं भगवान शंकर भी नहीं कर पाए। भगवान शंकर ने काम पर विजय तो पाई, पर उन्होंने काम को क्रोध से जला दिया था। इससे नारदजी को मन ही मन लगा कि वे तो शिव से भी कहीं आगे हैं। उन्हें इतना अहंकार आया कि शिव, ब्रह्मा के मना करने पर भी भगवान विष्णु को बताने बैकुंठ जा पहुंचे। इससे भगवान विष्‍णु ने भांप लिया कि नारद के हृदय में अहंकार का पौधा उग आया है।

नारद को अहंकार मुक्त कराने के लिए भगवान ने मोहनी का रूप धारण किया। नारद उसके मोह में वशीभूत हो गए कि अपनी सुधबुध खो बैठे। वे ईश्‍वर के मोहिनी रूप के साथ सांसारिक जीवन में इस कदर रम गए कि ईश्‍वर का ध्‍यान समेत सबकुछ भूल गए। जब उन्‍हें होश आया तब वह समझे कि यह नारायण प्रभु की माया है। व्‍यथित होकर उन्‍होंने प्रभु को श्राप दे दिया कि उन्‍हें पृथ्‍वी लोक में जन्‍म लेना होगा और भार्या के वियोग में भटकना होगा। कथा में श्रीराम का अवतरण होते ही श्रद्धालु नाच उठे। कथा में पूर्व मंत्री पीसी शर्मा, महंत चंद्रमादास त्यागी, प्रमोद नेमा भी मौजूद रहे।

Posted By: Ravindra Soni

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