Tiddi attack in MP वैभव श्रीधर. भोपाल। राजस्थान से मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और दिल्ली में सक्रिय हुआ टिड्डियों का दल अभी सिर्फ भोजन की तलाश में हवा के रुख के साथ भ्रमण कर रहा है। टिड्डियां अभी प्रजनन के लिए परिपक्व नहीं हुई हैं। इनका रंग अभी गुलाबी है और यह किशोरवय अवस्था में है।

मध्य प्रदेश में इसी अवस्था में टिड्डियों ने प्रवेश किया और हरियाली चट करते हुए आगे बढ़ीं। जब इनका रंग पीला होगा, तब यह प्रजनन के लिए रेतीली जगह तलाशेंगी, क्योंकि टिड्डियां जमीन में 10 से 15 सेंटीमीटर भीतर जाकर अंडे देती हैं। मध्य प्रदेश में अब 10 फीसद ही टिड्डियां छोटे-छोटे दलों में बची हैं।

केंद्रीय एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन केंद्र, इंदौर के सहायक वनस्पति संरक्षण अधिकारी डॉ. रवि कुमार छापरे का कहना है कि 20 साल पहले इतनी बड़ी तादाद में टिड्डियों का दल आया था। यह अब नेपाल तक पहुंच गया है। टिड्डियों पर काम करने वाले केंद्र सरकार के टिड्डी चेतावनी संगठन जोधपुर के संयुक्त संचालक डॉ. केएल गुर्जर ने बताया कि टिड्डियों का जीवनकाल 90 दिन का होता है। पाकिस्तान से यह राजस्थान होती हुई आगे बढ़ती हैं।

सामान्यतः इन्हें राजस्थान में ही नियंत्रित कर लिया जाता है। प्रजनन के लिए इन्हें रेतीली जगह चाहिए होती है। प्रजनन के बाद 45 दिन तक इन्हें जन्म के स्थान पर ही आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है। इसके बाद इनके पंख निकल आते हैं और यह उड़ने लगती हैं। राजस्थान में हरियाली नहीं मिली इस बार राजस्थान में टिड्डियों को भोजन के लिए हरियाली नहीं मिली और ये भोजन की तलाश में हवाओं के रुख के साथ आगे बढ़ती चली गईं।

वहीं, डॉ. छापरे ने बताया कि टिड्डियों का दल मई में मध्य प्रदेश में किशोरवय अवस्था में भोजन की तलाश में आया था। यहां इन्हें भोजन के लिए खेतों में फसल तो नहीं मिली पर जंगल में हरियाली मिल गई, इसलिए यह 40-45 किलो मीटर के क्षेत्र में ही सक्रिय रहीं। टिड्डियां नर्म पत्ते खाती हैं, लेकिन पेड़ों में भी नए पत्ते कम होने के कारण यह आगे बढ़ गईं।

नियंत्रण का वक्त सुबह का बेहतर

टिड्डियों के नियंत्रण के लिए सुबह चार से आठ बजे तक का समय रहता है। इसके बाद ये फिर से उड़ जाती हैं। मध्य प्रदेश में नियंत्रण का काम बेहतर रहा, इसकी वजह से अब सिर्फ दस फीसद टिड्डियां ही छोटे-छोटे समूह में बची हैं। मध्य प्रदेश से टिड्डियों के कुछ दल उत्तर प्रदेश और कुछ महाराष्ट्र गए हैं। इस बार जो दल देखने में आया है, वैसा लगभग 20 साल पहले आया था।

बदलता रहता है रंग

सीहोर कृषि महाविद्यालय से सेवानिवृत्त कीट विज्ञानी डॉ. कृष्ण कुमार नेमा ने बताया कि टिड्डियां मूलतः हरे रंग की होती हैं और अवस्थाओं के अनुसार इनका रंग बदलता है। इनमें न्यूरो केमिकल टेरोटॉनिन पैर रगड़ने से बनता है और यह एक-दूसरे के पास आते हैं, तब दल बनता है।

35-40 दिन में इनके पंख आते हैं और उड़ान भरना शुरू कर देते हैं। कीटनाशक के छिड़काव से जो टिड्डियां मर जाती हैं, वे जमीन में मिल जाती हैं। बारिश में यह पानी के साथ बहकर नदी व नालों में चली जाती हैं और जलीय जीव इन्हें खा लेते हैं। वहीं, खेतों में यह जब फसल की बोवनी के लिए खेत तैयार किए जाते हैं, तब मिट्टी में मिल जाती हैं।

Posted By: Hemant Kumar Upadhyay

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