- विश्व अंगदान दिवस आज : अंगदान व देहदान करने वालों को परिवार-समाज से लेनी पड़ रही बुराई, अंगदान करने वालों के परिजनों का सम्मान

भोपाल। नवदुनिया प्रतिनिधि

अंगदान की अहमियत तो सब को पता है, लेकिन रीति-रिवाज व धार्मिक मान्यताएं इसमें आड़े आ रही हैं। कुछ लोग इसे तोड़ना चाहते हैं तो समाज व परिवार के लोग नाराज हो जाते हैं। हम ऐसी ही दो महिलाओं के साहस की कहानी बता रहे हैं। इनमें एक ने अपने ससुर की देह व नेत्रदान कराया। दूसरी ने अपने पति का देहदान करने की कोशिश की पर परिवार में विरोध के चलते हार गई।

विश्व अंगदान दिवस (13 अगस्त) के संदर्भ में रविवार को किरण फाउंडेशन की ओर से एक होटल में आयोजित कार्यक्रम में देहदान व अंगदान करने वालों के परिजनों ने अपनी बात रखी। कुछ ने सरकारी व्यवस्था पर सवाल खड़े किए तो कुछ ने धार्मिक मान्यताओं के चलते आने वाली दिक्कतें बताईं। इस दौरान हमीदिया अस्पताल के नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. हिमांशु शर्मा ने कहा कि मप्र ही नहीं देशभर में अंगदान बहुत कम है। जागरुकता से ही इसे बढ़ाया जा सकता है। इस दौरान स्वास्थ्य विभाग के डिप्टी डायरेक्टर डॉ. उपेन्द्र दुबे, एएसपी समीर यादव, फाउंडेशन की तरफ से डॉ. राकेश भार्गव ने अंगदान की अहमियत व इसकी प्रक्रिया बताई। इस मौके पर अंगदान व देहदान करने वालों के परिजनों का सम्मान किया गया।

- इनके परिजनों का सम्मान

शशांक कोराने, अतुल लोखंडे, राजेन्द्र सिंह राजपूत, अमित भार्गव, अजय शिर्के, सुरेन्द्र जैन, कमल भंडारी, विश्दीप वर्मा, अंबिका प्रसाद श्रीवास्तव, त्रिलोक चंद जैन शच्च्तिा नागदेव।

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- लोगों को जागरूक करने की जरूरत

केस-1ः अगस्त 2016 में नेहरू नगर भोपाल के रहने वाले कृष्णा वानखेड़े का निधन हो गया। उन्होंने कहा था कि उनकी देह को जलाना नहीं। मेडिकल कॉलेज को दान कर देना। उन्होंने देहदान का फार्म भी भरा था। निधन के बाद उनकी पत्नी वीना ने देहदान करने का निर्णय लिया तो परिवार-समाज कुछ लोग आग आए। उन्होंने कहा कि धार्मिक मान्यता के अनुसार देहदान नहीं कर सकते। मेडिकल कॉलेज में बॉडी में कीड़े तक लग जाते हैं। विरोध के चलते देहदान नहीं हो सका। हालांकि, वीना को अभी भी यह अफसोस है कि वे पति की अंतिम इच्छा पूरी नहीं कर पाईं। वे कहती हैं इसके लिए लोगों को जागरूक करने की जरूरत है।

- बहू ने दान की आंखें, खुद भी लिया संकल्प

केस 2ः भोपाल के ही रहने वाले सुरेन्द्र जैन का इसी साल जनवरी में बे्रन स्ट्रोक से निधन हो गया। उन्होंने अपने दोस्तों से देहदान व अंगदान करने की इच्छा जताई थी। निधन के बाद उनकी बहू साधना जैन ने देह व आंखें दान कर दीं। इसका समाज के लोगों ने विरोध किया। कुछ ने यह भी कहा कि यह जैन धर्म के अनुकूल नहीं है। साधना जैन ने कहा कि अंगदान कर व्यक्ति अमर हो सकता है। उन्होंने खुद अंगदान व देहदान का संकल्प लिया है।

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