भोपाल से शशिकांत तिवारी। World AIDS Day 2019 मध्य प्रदेश(Madhya Pradesh) में एचआईवी/एड्स की रोकथाम के लिए जागरूकता फैलाने मप्र स्टेट एड्स कंट्रोल सोसायटी हर साल करीब 12 करोड़ रुपए खर्च कर रही है। यह राशि 64 गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) को इस बीमारी से बचाव व रोकथाम के लिए दी जा रही है। हालांकि इसके बाद भी प्रदेश में हर साल संक्रमित मरीजों की संख्या बढ़ रही है। 2005 से अब तक एचआईवी पॉजिटिव(HIV Positive) मरीजों का आंकड़ा 64 हजार तक पहुंच गया है। इस रोग से संक्रमित होने वालों की संख्या यौन संपर्क की बड़ी वजह से लगातार बढ़ रही है। अच्छी बात यह है कि संक्रमित सीरिंज के उपयोग, खून चढ़ाने और मां से बच्चों में होने वाला एचआईवी संक्रमण लगातार कम भी हो रहा है। जागरूकता के लिए काम करने वाले एनजीओ उच्च जोखिम वाले लोगों जैसे महिला सेक्स वर्कर, इंजेक्शन से नशीली दवा लेने वाले लोगों और समलैंगिकों के बीच काम कर रहे हैं। सरकारी अमले के लोग इस काम में न दक्ष हैं और न उन्हें इसकी जिम्मेदारी दी जाती है। ऐसे में यह सवाल लाजमी है कि जब जागरूकता के नाम पर हर साल इतनी बड़ी राशि खर्च की जा रही है तो फिर मरीजों की संख्या कम क्यों नहीं हो रही है।

एआरटी केंद्रों में मिलता है मुफ्त इलाज, काउंसलिंग : एड्स या एचआईवी पॉजिटिव होना स्वयं कोई बीमारी नहीं है बल्कि यह पीड़ित के शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कम करता है। इससे वह दूसरी बीमारियों की चपेट में आकर जान गंवा देता है। पीड़ित व्यक्ति के इलाज और रोग प्रतिरोधक क्षमता को बनाए रखने के लिए प्रदेश में 18 एंटी रिट्रोवायरल थैरेपी (एआरटी) केंद्र बनाए गए हैं। एचआईवी संक्रमित व्यक्ति को यहां पर पंजीकृत किया जाता है। बीमारी होने पर इलाज शुरू किया जाता है। इलाज तीन श्रेणी में होता है। फर्स्ट लाइन ट्रीटमेंट, सेकंड लाइन ट्रीटमेंट और थर्ड लाइन ट्रीटमेंट। शुरुआत में मरीजों को फर्स्ट लाइन में रखा जाता है। जब इसकी दवाएं मरीजों में कारगर नहीं होतीं तो सेकंड लाइन और इसके बाद थर्ड लाइन ट्रीटमेंट शुरू किया जाता है। मध्य प्रदेश में 27000 मरीज एआरटी केंद्रों में इलाज ले रहे हैं। सेकंड लाइन में केवल 358 और थर्ड लाइन में चार मरीज हैं।

यानी कुल मरीजों का 1.4 फीसदी ही सेकंड या थर्ड लाइन में है। इसकी वजह यह है कि एचआईवी पॉजिटिव लोगों ने अपनी जिंदगी को 'पॉजिटिव' तरीके से जीना सीख लिया है। उनका कहना है कि दवा भी तभी असर करती है, जब आप सकारात्मक होते हैं। यहां पर एचआईवी पॉजिटिव लोगों की काउंसलिंग की जाती है। नियमित जांच की जाती है। रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए मुफ्त में दवाएं दी जाती हैं। प्रदेश के भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, रीवा और सागर मेडिकल कालेजों में एआरटी सेंटर हैं। इसी तरह रीवा, उज्जैन, खंडवा, मंदसौर, सिवनी, नीमच, धार, बड़वानी, बुरहानपुर, रतलाम, बालाघाट, शिवपुरी व खरगोन जिला अस्पतालों में ये केंद्र हैं।

अभी जो मरीज दिख रहे हैं वे आठ से 12 साल पहले संक्रमित हुए होंगे। पॉजिटिविटी का प्रतिश्ात व इंसीडेंस रेट लगातार कम हो रहा है। इससे साफ है कि आने वाले सालों में एचआईवी संक्रमित लोगों की संख्या काफी कम हो जाएगी। - प्रशांत मलैया, डिप्टी डायरेक्टर, मप्र स्टेट एड्स कंट्रोल सोसायटी, भोपाल

एड्स पीड़ितों को योग ने सिखाया कैसे रखना है जिंदगी का 'ध्यान'

जब पता चला कि एचआईवी से संक्रमित हैं तो लगा सब कुछ खत्म हो गया। पूरी रात नींद नहीं आती थी। लगता था पता नहीं कब तक की जिंदगी है। इसी निराशा के दौर में कुछ लोगों ने जिंदगी में फिर नया जोश भर दिया। अब जिंदगी सिर्फ जीने के लिए नहीं बल्कि एक मकसद को पाने की है। मकसद है एचआईवी/ एड्स के साथ जी रहे लोगों की मदद करना। यह कहना है सेना से सेवानिवृत्त हुए 49 साल के एक व्यक्ति का। वे करीब 20 साल से एचआईवी पॉजिटिव हैं और भोपाल के एआरटी केंद्र में दवाएं ले रहे हैं। ऐसे ही कई लोग अपने हौसले की बदौलत एड्स को मात दे रहे हैं। साथ ही दूसरों में भी सकारात्मक ऊर्जा भर रहे हैं। यही इस बीमारी से लड़ने की सबसे बड़ी जरूरत है।

केस-1 : असम की 45 साल की एक महिला 25 साल से एचआईवी संक्रमित हैं। वे 21 साल से दवा ले रही हैं। अभी भी केवल फर्स्ट लाइन ट्रीटमेंट की जरूरत है। उनकी सकारात्मक सोच को देखते हुए वहां की सरकार ने उन्हें एड्स नियंत्रण कार्यक्रम में जोड़ा है। उनका कहना है सकारात्मक सोच के साथ जहर भी पीया जाए तो अमृत बन जाता है। उन्होंने एक दिन भी दवा नहीं छोड़ी। नियमित योग, ध्यान व व्यायाम करती हैं।

केस-2 : उज्जैन निवासी 43 साल की एक महिला को 2003 में एचआईवी से संक्रमण का पता चला। उनके पति का इस बीमारी की वजह से निधन हो चुका है। दो बच्चे हैं। वे नेशनल एचआईवी पॉजिटिव नेटवर्क से जुड़कर एचआईवी/एड्स पीड़ितों को जीने की नई राह दिखा रही हैं। घर, अस्पताल या दफ्तर में पीड़ितों के साथ भेदभाव होता है तो वे उनके लिए लड़ाई लड़ती हैं।

केस-3 : भोपाल में एचआईवी/एड्स पीड़ितों के लिए काम करने वाले 42 साल के एक व्यक्ति ने बताया कि वह 2003 से एआरटी केंद्र में दवाएं ले रहे हैं। सुबह उठकर व्यायाम करते हैं। इसके बाद योग व ध्यान करते है। उन्होंने कहा कि ध्यान करने से सकारात्मक ऊर्जा आती है।

एचआईवी संक्रमित होने के बाद अगर व्यक्ति योग, ध्यान, नियमित दवा और स्वस्थ आहार लेता है तो 40 साल या इससे अधिक सालों तक भी सामान्य जिंदगी जी सकता है। - डॉ. हेमंत वर्मा, प्रभारी, एआरटी सेंटर, हमीदिया अस्पताल, भोपाल

हमारे संपर्क में कई ऐसे मरीज हैं जो योग के चलते कई सालों से एड्स और कैंसर को मात दे रहे हैं। मानसिक बीमारियों जैसे डिप्रेशन आदि से उबरने में भी योग-ध्यान से काफी मदद मिलती है। - महेश अग्रवाल, योगाचार्य, भोपाल

Posted By: Prashant Pandey