World Cancer Day 2020 भोपाल से शशिकांत तिवारी। एक पल के लिए मृत्यु से नजदीकी का अहसास करवा देने वाली बीमारी कैंसर से मध्य प्रदेश में हर साल करीब 30 हजार लोगों की मौत हो रही है। बीमारी के बढ़ते आंकड़ों के साथ सरकारी चिकित्सा सुविधाएं बढ़ाए जाने की सख्त जरूरत है लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा। निजी अस्पतालों में महंगे इलाज के चक्कर में मरीज का पूरा परिवार, जीवन अस्त-व्यस्त हो रहा है। सरकारें मध्य प्रदेश में एक भी ऐसा शासकीय अस्पताल नहीं बना पाई हैं जहां कैंसर मरीजों को इलाज की पूरी व अच्छी सुविधा एक ही परिसर में मिल सके। यही वजह है कि मध्य प्रदेश के 90 फीसदी से भी ज्यादा कैंसर मरीज मुंबई, नागपुर, दिल्ली आदि बड़े शहरों में इलाज के लिए जाने को मजबूर हैं।

ऐसे में इलाज पर भारी-भरकम खर्च के साथ ही आने-जाने और ठहरने का खर्च भी बहुत ज्यादा हो रहा है। मध्य प्रदेश के 13 सरकारी मेडिकल कॉलेजों व भोपाल स्थित एम्स, कहीं भी इलाज की सभी सुविधाएं नहीं हैं। कहीं कैंसर के विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं हैं तो कहीं रेडियोथैरेपी तो कहीं कीमोथैरेपी की सुविधा नहीं है। कुछ मेडिकल कॉलेज तो नए खुले हैं लेकिन दशकों से चल रहे मेडिकल कॉलेजों में भी कैंसर के इलाज को लेकर स्थिति निराशाजनक है। भोपाल के गांधी मेडिकल कॉलेज में कैंसर का एक भी विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं है।

रेडियोथैरेपी विभाग में चार डॉक्टर हैं लेकिन कोबाल्ट-60 व ब्रैकीथैरेपी (इंटरनल रेडिएशन थैरेपी) मशीन बंद है। मरीजों को कीमोथैरेपी दी जा रही है पर उसका कोई विशेषज्ञ नहीं है। एम्स में कैंसर सर्जरी विभाग में सिर्फ एक डॉक्टर है। रेडियोथैरेपी के तहत की जाने वाली सिकाई के लिए सिर्फ लीनियर एक्सीलरेटर है। इंदौर, भोपाल, ग्वालियर, जबलपुर, रीवा व सागर मेडिकल कॉलेज में सरकार मरीजों की सिकाई के लिए पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) से लीनियर एक्सीलरेटर लगाने की तैयारी कर रही है, पर इसमें अभी करीब सालभर लग जाएंगे।

मरीजों का दर्द बढ़ा रही महंगी दवाएं : भारत सरकार द्वारा मूल्य नियंत्रण के दायरे में लाए जाने के बाद भी कैंसर की दवाएं बेहद महंगी हैं। मसलन, कीमोथैरेपी की दवा पैक्लीटैक्सिल-260 का होलसेल मूल्य 2000 रुपए है, जबकि मरीजों को यह दवा खुले बाजार में करीब 12 हजार रुपए में मिलती है। कैंसर मरीजों को दी जाने वाली एंटीबायोटिक्स व अन्य दवाएं भी बेहद महंगी हैं।

मध्य प्रदेश में कैंसर विशेषज्ञों की कमी की बड़ी वजह आंकोलॉजी में सुपर स्पेशलिटी की सीटें सरकारी कॉलेजों में नहीं होना है। देशभर के मेडिकल कॉलेजों में डीएम (मेडिकल आंकोलॉजी) की 108 और एमसीएस (सर्जिकल आंकोलॉजी) की 118 सीटें हैं। मप्र में सिर्फ निजी अरविंदो मेडिकल कॉलेज में डीएम (आंकोलॉजी) की दो सीटें हैं।

बदहाली की कई तस्वीरें

- रीवा के सरकारी मेडिकल कॉलेज में कैंसर विभाग में सिर्फ एक डॉक्टर है। कैंसर मरीजों की कीमोथैरेपी नहीं हो पा रही है।

- नेताजी सुभाषचंद्र बोस मेडिकल कॉलेज अस्पताल जबलपुर में चार विशेषज्ञ, दो कोबाल्ट यूनिट, एक ब्रैकीथैरेपी यूनिट हैं। रेडियोथैरेपी की दो यूनिट संचालित हो रही हैं। कीमोथैरेपी की सुविधा उपलब्ध है लेकिन रेडियोथैरेपी के लिए करीब 15 दिन की प्रतीक्षा सूची रहती है।

- इंदौर के एमवाय परिसर में स्थित शासकीय कैंसर अस्पताल में 1967 में बनाई गई तकनीक (कोबाल्ट) की मशीन से रेडियोथैरेपी मरीजों को दी जा रही है। मरीजों की बढ़ती संख्या के कारण डॉक्टर मशीन की क्षमता से चार गुना ज्यादा उपयोग लेने पर मजबूर हैं। हर दिन 80 से 90 मरीजों को थैरेपी दी जाती है। पुरानी तकनीक के चलते मरीज को रेडिएशन देने से सामान्य कोशिकाओं को भी ज्यादा नुकसान पहुंचता है। इस अस्पताल में हर साल चार हजार के लगभग नए मरीज पहुंच रहे हैं। यहां स्तन कैंसर की जांच के लिए मेमोग्राफी की सुविधा भी नहीं है।

- जबलपुर में सेंट्रल कैंसर इंस्टीट्यूट बन रहा है। अभी तक केवल उसकी बिल्डिंग बनी है। केंद्र व राज्य सरकार मिलकर बनवा रहे हैं।

कैंसर की स्टेज-1 से स्टेज-3 के बीच के औसतन 50 फीसदी से ज्यादा मरीज ठीक हो जाते हैं। इस बीमारी में हौसला बनाए रखने की जरूरत होती है। अब ऐसी तकनीकें भी आ गई हैं, जिससे चौथी स्टेज का मरीज भी छह से सात साल तक सामान्य जिंदगी जी सकता है। इसमें इम्युनोथैरेपी भी शामिल है। - डॉ. अतुल समैया, कैंसर सर्जन, भोपाल

इंदौर के शासकीय कैंसर अस्पताल में सीमित संसाधनों में भी हर मरीज को बेहतर व समय पर इलाज उपलब्ध कराया जा रहा है। अभी हो यह रहा है कि अधिकांश मरीज कैंसर की तीसरी व चौथी स्टेज में यहां आ रहे हैं। पहले कई मरीज निजी अस्पतालों में इलाज कराते हैं। जब उनके पास पैसा खत्म हो जाता है तो निजी अस्पताल यहां जाने की सलाह दे देते हैं। अगर वे सीधे यहां आएं तो समय पर पूरा इलाज मिल सकेगा। - डॉ. रमेश आर्य, अधीक्षक, शासकीय कैंसर अस्पताल, इंदौर

इंदौर में शासकीय कैंसर अस्पताल में जल्दी ही सुविधाएं बढ़ेंगी। सरकार इसे लेकर गंभीर है। - डॉ. विजयलक्ष्मी साधौ, मंत्री, चिकित्सा शिक्षा, मप्र

Posted By: Prashant Pandey

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