भोपाल (नवदुनिया प्रतिनिधि)। जिंदगी मांगने के लिए तो व्यक्ति भगवान की चौखट पर ही जाता है। मुझे एक समय लगा था सब कुछ खत्म हो जाएगा, लेकिन वह तो भगवान ही थे जिन्होंने मुझे नई जिंदगी दे दी। वह रातें थी, जब करवट बदलते अंधेरी जिंदगी के बारे में सोचता रहता था और अब की रातें हैं जब कभी नींद खुलती है तो मझे भगवान की तरह याद आ जाता है वह परिवार जिन्होंने अपने स्वजन के ब्रेन डेड होने के बाद लिवर दान कर मुझे जिंदगी दे दी। मेरी पत्नी की जिंदगी में खुशियां वापस ला दीं। मुझे लिवर ट्रांसप्लांट कराए हुए पांच साल हो गए हैं, लेकिन अब मैं बीमारी से पहले की तरह ही पूरी तरह से स्वस्थ हूं। यह शब्द हैं सीएमएचओ कार्यालय के कर्मचारी प्रवीण प्रधान के। वह भोपाल के पहले व्यक्ति हैं, जिन्हें ब्रेन डेड मरीज से मिला लिवर लगाया गया था।

जबलपुर में करीब 57 साल के एक व्यक्ति को ब्रेन हेमरेज होने पर उनकी लिवर व किडनी स्वजन ने दान कर दी थीं। प्रधान को सिद्धांता अस्पताल में लिवर लगाया गया था। प्रवीण बताते हैं कि उन्होंने यह सोच लिया था कि हार नहीं मानेंगे। हर हाल में जिंदगी की जंग जीतना है। ट्रांसप्लांट सफल रहा है। उनके घर वालों ने उस परिवार को खोजकर मिलने की इच्छा भी जताई, जिन्होंने लिवर दान किया था, लेकिन दान करने वाले मिलने के लिए उत्साहित नहीं दिखे।

शहर में पांच हजार लोगों का लिवर ट्रांसप्लांट की जरूरत

भोपाल के प्रतिष्‍ठित गैस्ट्रो सर्जन डा. सुबोध वार्ष्णेय ने बताया कि भोपाल में करीब पांच हजार लोग लिवर फेल होने की स्थिति से जूझ रहे हैं। इनमें आधे से ज्यादा ऐेसे हैं जो लिवर ट्रांसप्लांट का खर्च उठाने की स्थिति में नहीं हैं। कुछ चिकित्सकीय कारणों से भी ट्रांसप्लांट नहीं करा पाते। सभी को मिला लें तो करीब पांच हजार लोगों कों ट्रासंप्लांट की जरूरत है। ब्रेन डेड मरीजों से साल में एक या दो लिवर ही मिल पाते हैं। इसी तरह से शहर में करीब तीन हजार लोगों को किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत हैं, ब्रेन डेड मरीजों से वर्ष में तीन से चार किडनी दान में मिलती हैं।

Posted By: Ravindra Soni

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