बुरहानपुर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। जिला मुख्यालय से करीब बीस किमी दूर महल गुलआरा गांव में उतावली नदी के किनारे अब भी बेगम गुलआरा और मुगल बादशाह शाहजहां के प्रेम की निशानियां मौजूद हैं। जिन्हें देखने हर साल देसी और विदेशी सैलानी पहुंचते हैं।

इतिहासकार बताते हैं कि शाहजहां को गुलआरा नाम की नृत्यांगना से प्रेम हो गया था। उसके साथ जलप्रपात का आनंद लेने के लिए उन्होंने उतावली नदी में बनाए गए बांध के दोनों किनारों पर नक्काशीदार आलीशान इमारतें बनवाई थीं। बाद में उन्होंने गुलआरा से निकाह कर अपनी बेगम बना लिया था। वर्षा के दिनों में जब उतावली में भरपूर पानी होता है तो यहां बनने वाला जलप्रपात हर किसी का मन मोह लेता है।

इतिहास के जानकार बताते हैं कि इस मौसम में शाहजहां घंटों बेगम गुलआरा के साथ यहां वक्त बिताते थे। चांदनी रात में यहां गीत-संगीत की महफिलें भी सजा करती थीं। पहले इस गांव का नाम करारा था, जिसे बाद में महल गुलआरा के नाम से जाना जाने लगा।

चार सौ साल पहले हुआ था निर्माणः इतिहासकार मोहम्मद नौशाद के मुताबिक वर्ष 1615 में अब्दुल रहीम खान-ए-खाना ने मुगल बादशाह जहांगीर के आदेश पर जैनाबाद के आहूखाना में पानी की व्यवस्था के लिए करारा गांव स्थित छोटी उतावली नदी पर स्टाप डैम का निर्माण कराया था। बुरहानपुर के कुंडी भंडारा की तरह करारा गांव से आहूखाना तक कुंडियों के माध्यम से पानी पहुंचाया जाता था। जब शाहजहां अपने पिता के साथ बुरहानपुर आए और इस स्थान पर शिकार के लिए पहुंचे तो उनको वहां की खूबसूरती भा गई। पिता की मृत्यु के बाद शाहजहां तख्त पर बैठे तो उनके स्वागत में इसी स्थान पर मुजरे की महफिल सजाई गई थी। इसी दौरान उनका दिल नृत्यांगना गुलआरा पर आया था।

देखरेख के अभाव में जर्जर हुआ भवनः महल गुलारा दो मंजिला भवन है। जिसके ऊपर खूबसूरत गुंबद बनवाए गए थे। दोनों महल लगभग 50 बाय 50 वर्गफीट में ईंट व चूने से बने हैं। स्टापडैम की लंबाई करीब 120 फीट, ऊंचाई 30 फीट तथा चौड़ाई 8.3 फीट है। कई साल पहले इस ऐतिहासिक इमारत को पुरातत्व विभाग के सुपुर्द कर दिया गया था। विभाग द्वारा इसकी मरम्मत नहीं कराने व देखरेख के अभाव में अब ये जर्जर हो चुकी हैं। यहां आने वाले सैलानी भवन की बनावट और न-ाशी देखकर आज भी हैरत में पड़ जाते हैं। भवन की छत कई जगह से टूट गई है।

Posted By: Nai Dunia News Network

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