बड़ामलहरा(नईदुनिया न्यूज)। पर्यूषण पर्व के तप धर्म के दिन मुनि विरंजन सागर महाराज में धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जब भी मुक्ति मिलेगी, तप के माध्यम से ही मिलेगी। विभिन्ना प्रकार के तपों का आलम्बन लेकर जीव समय-समय पर आत्मा की आराधना में लगा रहता है, उसे ही मोक्षपद प्राप्त होता है।

मुनिश्री ने कहा कि आचार्यों ने तप के दो भेद कहे हैं एक भीतरी अंतरंग तप और दूसरा बाह्य तप। बाहरी तप एक प्रकार से साधन के रूप में है और अंतरंग तप की प्राप्ति में सहकारी है। बाहरी तप के बिना भीतरी तप का उद्भव सम्भव नहीं है जैसे दूध को तपाना हो तो सीधे अग्नि पर तपाया नहीं जा सकता। किसी बर्तन में रखकर ही तपाना होगा। दूध को बर्तन में तपाते समय कोई पूछे कि क्या तपा रहे हो, तो यही कहा जायेगा कि दूध तपा रहे हैं। कोई भी यह नहीं कहेगा कि बर्तन तपा रहे हैं, जबकि साथ में बर्तन भी तप रहा है। पहले बर्तन ही तपेगा फिर बाद में भीतर का दूध तपेगा। इसी प्रकार बाहरी तप के माध्यम से शरीर रूपी बर्तन तपता है और बाहर से तपे बिना भीतरी तप नहीं आ सकता। उन्होंने कहा कि भीतरी आत्म-तत्व को तप के माध्यम से तपाकर सक्रिय करना हो, तो शरीर को तपाना ही पड़ेगा पर वह शरीर को तपाना नहीं कहलायेगा, वह तो शरीर के माध्यम से भीतरी आत्मा में बैठे विकारी भावों को हटाने के लिए, विकारों पर विजय पाने के लिए किया गया तप ही कहलायेगा। मुनिश्री ने कहा कि इसलिए कर्मों के क्षय के लिए जो तपा जाता है, उसे तप कहते हैं। इच्छा निरोधः तपः अर्थात इच्छाओं को रोकना या जीतना ही तप हैं।

उत्साह के साथ मनाई सुगंध दशमीः

बड़ामलहरा नगर में सुगंध दशमी उत्साह से मनाई गई। जिन भक्तों ने मंदिरों में पहुंच कर धूप खेवकर अपने कर्मों की निरजरा की। साथ ही उत्तम तप धर्म को अपनाने का संकल्प लिया। नगर के जिनभक्त गुरुवार को सुबह सुगंध दशमी मनाने के लिए हवन की धूप लेकर घर से निकल पड़े। तत्पश्चात उन्होंने सामूहिक रूप से धूप खेवन कर अपने- अपने कर्मों की निरजरा की। धूप खेवन में महिलाओं ने उत्साह के साथ भाग लिया और दोपहर में चन्द्रप्रभु मंदिर, फौजदार मंदिर,और पाटन मन्दिर सहित सकल दिगम्बर जैन मंदिर पहुंचकर जिनालयों के दर्शन भी किए।

Posted By: Nai Dunia News Network

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