छिंदवाड़ा। विश्व गीता प्रतिष्ठानम उज्जयनी की छिंदवाड़ा शाखा द्वारा राजराजेश्वरी मंदिर शक्तिनगर में आयोजित प्रबोधन कार्यक्रम में मुख्य वक्ता बतौर बोलते हुए प्रो. अमर सिंह ने कहा कि गीता भगवान कृष्ण की दिव्य कृपा की प्रामाणिक तात्विक चेतना की अभिव्यक्ति है। यह गीत रचना वस्तुओं में ईश्वर की मौजूदगी की शाब्दिक कलात्मक व्याख्या है। गीता जीवन प्रबंधन की युगीन दिव्य रचना है। यह आध्यात्मिक चेतना की उत्कृष्ट रचना है। इसमें मानव के सभी रहस्यमई प्रश्नों का समाधान है। यह समकालीन उदास और तीक्ष्‌ण लोगों के लिए खुशनुमा स्थिर चित्त होने वाली शांति प्रदाता है। संयोजक नेमीचंद व्योम ने कहा कि गीता का वैचारिक अमृत आधुनिक मानव के लिए आने वाले समय में गहराई से महसूस की गई, तार्किक प्रबलता से समझी गई, बौद्धिक और नैतिकता से भरे जीवनोपयोगी व्यावहारिक दृष्टि से उत्कृष्ट भावों का महासागर है। गीता असमंजस,संदेह,रंज और व्यग्रता से उपजी किंकर्तव्यविमूढता की औषधि है। रणजीत सिंह परिहार ने कहा कि कृष्ण अर्जुन को अस्थाई भौतिक शरीर और शाश्वत आध्यात्मिक आत्मा के बीच मूलभूत अंतर की विषद विवेचना करते हैं और स्थानांतरगमन की प्रक्रिया, निस्वार्थ सेवा की प्रकृति और आत्म-सिद्ध व्यक्ति की खूबियों की व्याख्या करते हैं। लक्ष्‌मण प्रसाद डहेरिया ने कहा कि अनुभवातीत ज्ञान- आत्मा का आध्यात्मिक ज्ञान, ईश्वर का ज्ञान और दोनों के रिश्ते- व्यक्ति को शुद्ध और बंधनमुक्त करता है। इस प्रकार का ज्ञान निस्वार्थ भक्तिमय कर्म से आता है। इसमें सिद्ध गुरू की आवश्यकता भी होती है। दुलीचंद जैन ने कहा कि वह जो शरीर, आत्मा और परमात्मा में स्वयं से परे होने का अंतर समझता है, उसे इस भौतिक संसार से मुक्ति मिल जाती है।

Posted By: Nai Dunia News Network

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