छतरपुर(नईदुनिया प्रतिनिधि)। जिले में संचालित 20 नर्सिंग होम और 170 निजी क्लीनिकों पर मरीजों का हर तरह से शोषण करके मनमानी की जा रही है। इनके लिए सारे कायदे-कानून बेमानी हैं। इसके बावजूद जिम्मेदार मौन बने हैं।

जिले में शासकीय स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह से वेंटिलीटर पर पहुंच चुकी हैं। ऐसे में मरीजों का निजी क्लीनिकों और नर्सिगं होम का रुख करना उनकी मजबूरी है। जहां मरीजों व उनके परिजनों से सिर्फ पैसा वसूलने का काम किया जाता है। साथ ही अधिकांश नर्सिंग होम में न बायोकेमिकल वेस्ट का सही तरीके से निस्पादन किया जाता है न अन्य प्रावधानों का पालन होता है। मरीजों का कहना है कि निजी नर्सिंग होम में पहुंचते ही मरीजों को विभिन्ना जांचों के नाम पर रकम वसूलने का काम शुरू कर दिया जाता है। इसके बाद उन्हें छोटी-मोटी बीमारी होने पर भर्ती करके मोटा बिल थमाया जाता है। जिसकी निजी क्लीनिकों के संचालक पाई-पाई वसूल लेते हैं। हालात ऐसे हैं कि विभागीय अधिकारियों को ही नहीं मालूम उन्होंने किसी निजी क्लीनिक व नर्सिंग होम का कब निरीक्षण किया था। ऐसे में क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट तार-तार हो रहा है। जब इस बारे में समाचार सुर्खियां बनते हैं तो कार्रवाई से बचने के लिए आनन-फानन में समिति गठित करके जांच करने कवायद शुरू कर दी जाती है, बाद में न तो एक भी क्लीनिक या नर्सिंग होम का निरीक्षण किए बिना सारी मुहिम ठप हो जाती है। नर्सिग होम व निजी क्लीनिक का निरीक्षण करने का अधिकार स्वास्थ्य विभाग के पास है मगर इन निजी क्लीनिकों व नर्सिंग होम का औचक निरीक्षण कब से नहीं किया यह जानकारी देने के नाम पर जिम्मेदार कतराते रहते हैं।

सरकारी डॉक्टर कर रहे निजी क्लीनिकों में प्रैक्टिसः

सरकारी अस्पतालों में पदस्थ डॉक्टर अस्पताल में कम और निजी क्लीनिकों व नर्सिंग होम में प्रैक्टिस करना ज्यादा पसंद करते हैं। निजी क्लीनिकों में प्राइवेट प्रैक्टिस अधिकांश शासकीय डॉक्टर ही करते हैं। विभागीय अधिकारी उनके खिलाफ कार्रवाई करने से कतराते हैं। हालांकि उच्चाधिकारियों द्वारा दिशा-निर्देश जारी किए जाने पर या गंभीर शिकायत मिलने पर ही जिम्मेदार निरीक्षण करने की खानापूर्ति कर लेते हैं। जिले में पंजीकृत निजी नर्सिंग होम व निजी क्लीनिक की जानकारी ऑनलाइन की गई है, बावजूद इसके पूरी जानकारी बेवसाइड में अपडेट नहीं की गई हैं। वहीं अधिकांश शासकीय डॉक्टरों ने अपने घरों में निजी क्लीनिकों का अड्डा बना रखा है। अस्पताल से ज्यादा यह डॉक्टर अपने घरों में ही मरीज को देखना पसंद करते हैं। डॉक्टरों द्वारा अपने-अपने मन मुताबिक 200 से 400 रूपये तक फीस निर्धारित की है, पर्चे में महंगी दवाएं उनके ही मेडिकल स्टोर से खरीदना पड़ती हैं। ऐसे में एक मरीज का कम से कम एक-दो हजार रुपए से अधिक का खर्च हो जाता है। सूत्रों की मानें तो जिला अस्पताल कार्यरत कई डॉक्टरों द्वारा अपने घरों में मरीजों को बुलाने के लिए अपने साथ कुछ लड़कों को लगाया जाता है। ये लोग मरीजों और उनके साथ वालों को बरगलाकर डॉक्टर के घर जाकर बेहतर इलाज दिलाने की बात करते हैं और मरीज के पहुंचते ही निजी अस्पताल में लूट खसोट शुरू कर दी जाती है।

वर्जन-

समय समय पर विभागी टीम सभी जगह पर नियमित निरीक्षण करती है। टीम द्वारा अभी कब से निरीक्षण नहीं किया है यह बता पाना मुश्किल है, ये तो रिकार्ड देखकर ही बता सकूंगा।

डॉ. विजय पथौरिया

सीएमएचओ, छतरपुर

Posted By: Nai Dunia News Network

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