हटा। स्वच्छता के जनक कहे जाने वाले संत गाडगे महाराज की 145वी जयंती धूमधाम से मां चंडीजी परिसर में मनाई गई।

जिसमें समाज के सभी वरिष्ठों की मौजूदगी रही और उन्होंने संत के जीवन पर प्रकाश डाला। शिक्षक मोतीलाल रजक ने बच्चों को शिक्षित बनाने की बात कही उन्होंने कहा कि भले ही भोजन एक समय खा लेना, लेकि न बच्चों को शिक्षा जरुर देना। समाज के अध्यक्ष कोमल रजक द्वारा समाज को संगठित रहने की बात करते हुए कहा कि संगठन में ही समाज की शक्ति निहित है। जिस प्रकार झाड़ू संगठित रहकर कचरा साफ करती है और बिखर जाने पर स्वयं कचरा बन जाती है।

रजक समाज को अनुसूचित जाति में शामिल करने के लिए समाज प्रयासरत है। डॉक्टर मदन रजक द्वारा समाज में व्याप्त कु रीतियों को बंद करने का आहवान कि या। प्रतिभावान छात्रों को उत्साहित करना और उनका सम्मान करना, शासन द्वारा चलाई जा रही योजनाओं को लाभ लेने की बात भी कही गई। कार्यक्रम में समाज के वरिष्ठ सदस्य गेंदालाल रजक, कल्लू रजक, डॉक्टर छन्नू रजक, पप्पू मासाब, टीकाराम, भैयालाल रजक, नन्नाई रजक, गफू र रजक, राजेश रजक, चिंतामन रजक, विशाल रजक, नंदलाल पंडा, महादेव बाथरे, राजू की मौजूदगी रही।

भागवत कथा सुनने से ही होती है ईश्वर की प्राप्ति- कथाव्यास

हटा। ग्राम बरबसपुरा में स्व चरणदास पटेल ग्राउंड पर चल रही भागवतकथा के तीसरे दिन कथा व्यास नारायण प्रसाद शास्त्री ने बताया कि भागवतकथा सुनने से ही ईश्वर की प्राप्ति हो जाती है।

उन्होंने कहा कि कि सी भी स्थान पर बिना निमंत्रण जाने से पहले इस बात का ध्यान जरुर रखना चाहिए कि जहां आप जा रहे है वहां आपका, अपने इष्ट या अपने गुरु का अपमान न हो। यदि अपने गुरु, इष्ट का अपमान होने की आशंका हो तो उस स्थान पर नहीं जाना चाहिए। चाहे वह स्थान अपने जन्म दाता पिता का ही घर क्यों न हो। भागवत कथा के दौरान सती चरित्र के प्रसंग को सुनाते हुए कहा कि भगवान शिव की बात नहीं मानने पर सती के पिता के घर जाने से अपमानित होने के कारण स्वयं सती को अग्नि में स्वाहा होना पड़ा था।

भागवत कथा में उत्तानपाद के वंश में ध्रुव चरित्र की कथा को समझाया गया। ध्रुव की सौतेली मां सुरुचि के द्वारा अपमानित होने पर भी उसकी मां सुनीति ने धैर्य नहीं खोया जिससे एक बहुत बड़ा संकट टल गया। परिवार को बचाए रखने के लिए धैर्य, संयम की नितांत आवश्यकता रहती है। भक्त ध्रुव द्वारा तपस्या कर श्रीहरि को प्रसन्न करने की कथा को सुनाते हुए बताया कि भक्ति के लिए कोई उम्र बाधा नहीं है। भक्ति को बचपन में ही करने की प्रेरणा देनी चाहिए क्योंकि बचपन कच्ची मिट्टी की तरह होता है उसे जैसा चाहे वैसा पात्र बनाया जा सकता है। जो व्यक्ति अपने जीवन में जिस प्रकार के कर्म करता है उसी के अनुरुप उसे मृत्यु मिलती है। भगवान ध्रुव के सत्कर्मो की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि साधना, उनके सत्कर्म व ईश्वर के प्रति अटूट श्रद्धा के परिणाम स्वरुप ही उन्हें बैकु ंठ लोक प्राप्त हुआ।

Posted By: Nai Dunia News Network

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