दमोह। देश की आजादी के लिए भले ही स्वतंत्रता संग्राम 1857 में शुरू हुआ लेकिन मध्यप्रदेश के दमोह में क्रांति 1842-43 में शुरू हो गई थी। बुंदेलखंड के लोधी समाज ने अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल फूंका था। देश को आजाद कराने वाले शूरवीरों के इतिहास में दमोह का नाम अमर है।

ऐसा इसलिए क्योंकि 10 अगस्त 1858 को पूरे देश में अपने एकाधिकार की घोषणा करने वाले अंग्रेज भी जिले की सीमा में साढ़े छह माह तक नहीं घुस पाए थे, क्योंकि दमोह जिले के हिंडोरिया के राजा किशोर सिंह के वैभव को सुनने के बाद अंग्रेज इस क्षेत्र में घुसने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे। जब पूरा देश अंग्रेजों का गुलाम हो चुका था, तब यहां के लोग आजाद भारत की फिजा में जी रहे थे।

जिला मुख्यालय से महज 15 किलोमीटर दूर नगर पंचायत हिंडोरिया में आज भी राजा किशोर सिंह के वंशज रहते हैं। आज भी वहां उनके वंशजों को राजा ही माना जाता है। जिले के इस गौरवशाली इतिहास को जानने के लिए हमें यहां के इतिहास के पन्नों को पलटने की जरूरत है, ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी भी अपने जिले के शूरवीरों की गाथाएं सुनकर उन पर अभिमान कर सके।

1842 में हुई थी पहली क्रांति

अंग्रेजों से लोहा लेने वाले इस राजपरिवार के पहले शूरवीर राजा जोरावर सिंह थे, उन्होंने नरसिंहपुर के राजा हिरदेशाह के नेतृत्व में 1842 की क्रांति की लड़ाई लड़ी थी। इस क्रांति की शुरुआत उप्र के ललितपुर से हुई थी। इस क्रांति में बुंदेलखंड की कमान राजा जोरावर सिंह के बेटे राजा किशोर ने संभाली थी।

यह क्रांति 3 साल 4 माह चली थी। इसे बुंदेला क्रांति भी कहा जाता है। 1982 में प्रोफेसर जेपी मिश्र जो मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. डीपी मिश्र के भतीजे हैं, उनके रिसर्च पेपर में इस क्रांति को बुंदेला विद्रोह के नाम से प्रकाशित किया है। इसके बाद 1842 की क्रांति ब्राह्मणों की लेखनी से राष्ट्र के सामने आई। इस क्रांति में देश के अनेक राजा, मुस्लिम समुदाय और भोपाल के नवाबों ने मिलकर लड़ी थी। 1857 में हुए संग्राम में भी राजा किशोर सिंह ने हिस्सा लिया।

पूरा देश गुलाम, केवल दमोह आजाद

राजा किशोर सिंह के इतिहास को लोगों के सामने लाने वर्ष 2005 से प्रयासरत इस परिवार के वशंज वैभव सिंह लोधी ने बताया कि देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम में उनके पूर्वजों का विशेष योगदान है। राजा जोरावर सिंह ने 1842 की क्रांति में अपनी वीरता का परिचय दिया था और उनके बेटे राजा किशोर सिंह ने 1842 और उसके बाद 1857 की क्रांति में अंग्रेजों को छठी का दूध याद दिलाया था। उन्होंने बताया कि 10 अगस्त 1858 को अंग्रेजों ने पूरे देश में अपने एकाधिकार की घोषणा की थी, लेकिन उस समय भी दमोह आजाद था।

अंग्रेजों ने कई बार जिले को गुलाम बनाने का प्रयास किया, लेकिन राजा किशोर सिंह की ताकत के आगे उनकी एक नहीं चली और अगले साढ़े 6 माह तक जिला आजाद ही रहा था। जब अंग्रेज जिले को गुलाम नहीं बना पाए तो उन्होंने समझौते की पेशकश की, जिसमें राजा किशोर सिंह ने शर्त रखी कि उनके जिले के किसी भी व्यक्ति को न तो सजा दी जाएगी, न ही उनकी संपत्ति जब्त की जाएगी। अंग्रेजों ने राजा की शर्त मानी, जब जिला अंग्रेजों के कब्जे में आ पाया था। इसी राजपरिवार के राहुल सिंह वर्तमान में दमोह विधायक हैं और प्रद्युम्न सिंह बड़ामहलरा से विधायक हैं।

Posted By: Hemant Upadhyay