देवास (नईदुनिया प्रतिनिधि)।

जब नर्स मां ड्यूटी से लौटती है तो तीन साल की बेटी इंतजार में घर के गेट पर खड़ी होती हैं, लेकिन मां अपनी बेटी को तुरंत उठाकर लाड़ प्यार नहीं कर पाती है। उस पल मां और बेटी के बीच कोविड संक्रमण के डर की दीवार आ जाती हैं। कई बार बेटी जिद करती है तो रूम में बंद करना होता है ताकि वह तुरंत छू ना सके। सैनिटाइजेशन के बाद ही नर्स मां अपनी बेटी को उठाकर ममता लुटा पाती है।

कोविड काल में रिश्तों के संघर्ष की कहानी जिला अस्पताल की नर्स मां आरती पटेल की है। जो कोविड वार्ड में लोगों की जिंदगी बचाने का कार्य करती है। आरती के पति बाल मुकुंद पटेल भी लैब टेक्निशयन हैं। जो सैंपलिंग का कार्य करते हैं। आरती ने बताया कि वे जबलपुर की रहने वाली हैं। देवास में पति के साथ रहती हैं। आरती ने बताया कि उनकी तीन साल की बेटी हर्षिका और पांच साल का बेटा अनिरुद्ध है। एक ही फील्ड में होने से ड्यूटी में मुश्किलें आती है। जब पति ड्यूटी पर होते है तो मैं बच्चों को संभालती हूं और जब मैं ड्यूटी पर रहती हूं तो पति दोनों बच्चों का ध्यान रखते हैं। कई बार तो एक समय ड्यूटी लग जाती है तो बच्चों को आयाबाई या फिर परिचितों के यहां छोड़ना पड़ता है। आरती का कहना है कि कोविड काल चल रहा है तो जबलपुर से भी परिवार वालों को बच्चों की देखभाल के लिए नहीं बुला सकते हैं।

-बच्चे फोन लगाते हैं तो वीडियो कॉलिंग पर बात करते हैं

आरती ने बताया कि ड्यूटी के दौरान बच्चों से कम ही बात हो पाती है। पहले तो ड्यूटी के दौरान मोबाइल लेकर नहीं आते थे। अभी लाने लगे हैं। बच्चे जिद कर फोन लगाते हैं तो वीडियो कॉलिंग पर बात करते हैं। स्थिति ऐसी होती है कि ज्यादा देर बातचीत नहीं कर पाते हैं। आरती ने बताया कि घर में एक अलग रूम में बाथरूम है। जहां गरम पानी से नहाने और सैनिटाइज होने के बाद ही बच्चों को हाथ लगाते हैं। पति भी कोविड सैंपलिंग करते हैं। दोनों जोखिम के बीच काम कर रहे हैं। इसलिए घर में अलग रूम और बाथरुम है।

-13 माह की बेटी देखकर ही रोने लगती है

नर्स रुक्मणि मेहरा चौकीकर भी कोविड वार्ड में ड्यूटी कर रही हैं। उनकी 13 माह की बेटी है, जिसे घर छोड़कर वो ड्यूटी पर आती है। इस दौरान पति बेटी का ध्यान रखते हैं। रुक्मणि ने बताया कि घर जाती हूं तो बेटी शेल्वी देखकर ही रोने लगती है। उसे तुरंत गोद में नहीं ले सकती हूं। ड्यूटी के दौरान तो उससे बात नहीं करती हूं, क्योंकि वह मेरी आवाज सुनकर रोने लगती है, इसलिए पति को फोन लगाकर बेटी का हालचाल पूछती हूं।

-जहां गई, वहां बेटियों की मदद की

एसपी कार्यालय में रीडर पुलिसकर्मी शैलजा भदौरिया ने भी बेटियों के लिए काम किया। वे करीब 25 साल से पुलिस सेवा में हैं। जिस थाने पर गई वहां बेटियों की मदद के लिए काम किया। ड्यूटी के दौरान पीपलरावां में खुद हेल्पलाइन शुरू की ताकि बेटियां छेड़छाड़ और अन्य घटनाओं की शिकायत कर सकें। उनकी खुद की एक बेटी हैं। शैलजा भदौरिया ने पुलिस विभाग के लगभग सभी महकमों में काम किया। वे ड्यूटी के दौरान संक्रमित भी हुई, लेकिन फिर ठीक होकर ड्यूटी पर लौटने वाली है।

Posted By: Nai Dunia News Network

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