विजय श्रीवास्तव, सेवा निवृत्त प्राचार्य देवास

कोई भी शहर सिर्फ उस शहर के राजनेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ उस शहर के बाशिंदों का भी होता है जो बरसों से उस शहर की आबोहवा में सांस लेते हैं। शहर की परंपराओं, उत्सवों, और तीज त्योहारों को जिन्होनें बचपन से जिया है। शहर की कमियों से दुखी और तरक्की से खुश होते हैं। जब शहर विकास के लिए कोई योजना बनाई जाती है और उन पर अमल होता हैं तो क्या उसमें शहर के उन नागरिकों की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए?

मैं अपने मन की और देवास के मन की बात साझा करते हुए ये जरूर कहना चाहूंगा कि विकास योजनाओं में मूल शहरवासियों की, भागीदारी भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

आम तौर पर होता ये है कि जिनके लिए और जिनके नाम पर सुविधाएं जुटाने की बात की जाती है उनकी आवाज ही नहीं सुनी जाती। विकास के चलते देवास को बहुत सी सौगातें मिली हैं लेकिन शहर ने खोया भी बहुत है। हमारा मीना बाजार, शुक्रवारिया हाट और पत्ती बाजार का खुलापन, नायाब वास्तुकला वाली बावड़ियां, ओलंपिक ग्राउंड, छोटी पाती का राजबाड़ा, ये सब केवल स्मृतियों में बचे हैं। मेंढकी तालाब (मंडूक पुष्कर) लोहे की जालियों में कैद हैं। कलेक्टोरेट का ऐतिहासिक भवन भी सुना है धराशायी होने वाला है।

यह वाकई विडंबना है कि शहर में विकास के नाम पर होते बदलाव को यहां के मूल बाशिंदे सिर्फ मूकदर्शक बनकर देखते रह जाते हैं। उनकी राय सलाह मशविरा कोई मायने नहीं रखता जो किसी भी स्थिति में उचित नही कहा जा सकता।

यदि शहर के विभिन्ना क्षेत्रों के वरिष्ठ नागरिकों और विशेषज्ञों की एक समिति गठित की जाकर शहर की योजनाओं पर उनकी भी राय ली जाय, तो यह शहर के हित में ही होगा। निर्वाचित प्रतिनिधि जो शहर के विकास की परिकल्पना करते हैं, यदि वरिष्ठ नागरिकों के ऐसे समूहों से चर्चा करें तो उन्हें अनेक उपयोगी एवं रचनात्मक सुझाव मिल सकते हैं। उन पर अमल करना या न करना बेशक जिम्मेदार व्यक्तियों पर निर्भर करेगा।

मेरे मन की याद गली......

दरअसल स्मृतियों में बसी पुरानी यादें बदलते समय के साथ सिर्फ गुदगुदा सकती हैं। कुछ पल का सुकून दे सकती हैं मगर वर्तमान को बदल नहीं सकती। खेड़ापति मंदिर के पीछे जहां पुलिस क्वार्टर हैं, पहले वहां तोपखाना था। आादी के बाद उस तोपखाने में एक प्राथमिक विद्यालय शुरू हुआ। 1956 से 61 तक वहां पढ़ने की याद है। फर्श कच्चा था, छह से दस वर्ष के बच्चे ही झाड़ू लगाते, पानी छिड़कते, टाटपट्टियां झटकारते। लीपने के लिए गोये से गोबर इकट्ठा करते, लीपते। पढ़ाई के साथ ये सब काम का आनंद अलग था। गांधीजी की बुनियादी शिक्षा का जोर था। बच्चों से यह श्रम करवाना आज की तरह गलत नहीं समझा जाता था।

Posted By: Nai Dunia News Network

NaiDunia Local
NaiDunia Local
  • Font Size
  • Close