देवास(नईदुनिया प्रतिनिधि)। जिला अस्पताल के एसएनसीयू वार्ड में डाक्टरों और नर्सों की टीम ने 46 दिन तक साढ़े सात माह में जन्मे नवजात की उखड़ती सांसों को थामने के लिए संघर्ष किया। नर्सों ने इस प्री मैच्योर बच्‍चे की मां की तरह देखभाल की। कटोरी-चम्मच से दूध पिलाने के साथ ही 24 घंटे निगरानी की। करीब डेढ़ माह बाद उसे गोद में पाकर मां की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े।

जिला अस्पताल की एसएनसीयू इंचार्ज और शिशु रोग विशेष डाक्टर वैशाली निगम ने बताया कि सिरोल्या गांव की अंगूरबाला पत्नी किशोर चौधरी 27 सितंबर को नवजात बच्चे के लेकर अस्पताल आए थे। बच्चा प्रीमैच्योर था। उसकी बमुश्किल धकड़न चल रही थी। वह ठीक से सांस नहीं ले पा रहा था। डॉक्टर केअनुसार बच्चे को सीवियर हाइपोथर्मिया(पूरा ठंडा) था। पूरा नीला पड़ गया था।

उसका जन्म रात 9.30 बजे निजी अस्पताल में हुआ था। वह हमारे पास रात 10.15 बजे आया था। हमारी टीम ने तुरंत उसका जीवन बचाने के प्रयास शुरू किए। उसे सीपैप मशीन पर शिफ्ट किया। टीम ने उसकी 24 घंटे निगरानी की। बीच में उसकी तबीयत भी बिगड़ी। लगा कि कभी भी कुछ भी हो सकता है, लेकिन हम लगातार प्रयास करते रहे। नर्सों ने बच्चे को कटोरी-चम्मच से दूध पिलाया। 46 दिन बाद ठीक होने पर उसे उसके माता-पिता को सौंप दिया। उसका वजन भी बढ़ा है। जब अस्पताल में लाए थे तो वह एक किलो 400 ग्राम का था। डिस्चार्ज करते समय वह एक किलो 600 ग्राम का हो गया था।

मां ने दूर से ही बेटे को देखा

किशोर चौधरी ने बताया कि निजी अस्पताल में पत्नी का इलाज चल रहा था। सोनोग्राफी कराने के बाद डाक्टरों ने कहा था कि अगर आगे ज्यादा दिन तक बच्चा गर्भ में रहता है तोे मां को खतरा हो सकता है। बच्चे की जान भी खतरे में हैं। डिलीवरी के बाद नवजात गंभीर हालत में था। उसकी जिंदगी की उम्मीद में जिला अस्पताल लेकर पहुंचे। हम दोनों बच्चे को दूर से देखते थे। नर्सों और डाक्टरों की टीम ने ही उसकी देखभाल की।

Posted By: Hemant Kumar Upadhyay

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