वीरेंद्र जैन, राजगढ़ (धार)। जैन धर्म में दीक्षा के समय और दीक्षा के बाद होने वाला केशलोचन साधु जीवन की महत्वपूर्ण क्रिया है। कई आचार्य और मुनिभगवंत स्व-हस्त इसे कर लेते हैं तो कई के लिए यह अन्य करते हैं। प्रक्रिया सहज नहीं है, लेकिन कुछ लोग ऐसे हैं जो सहजता से बगैर आंसू आए इसे कर देते हैं।

ऐसे ही व्यक्ति हैं गुजरात के नौसारी निवासी कौशिक कोठारी। 59 वर्षीय कोठारी 11 की आयु से आचार्य-मुनिभगवंतों के केशलोच कर रहे हैं। कोठारी 48 वर्ष में 20 हजार मुनिभगवंत व 250 से अधिक आचार्य-भगवंतों के केशलोच कर चुके हैं। बड़ी बात यह है कि इस कला को सीखने के लिए उन्होंने स्वयं पर पहले 12 बार लोच प्रक्रिया की थी। वे धार के राजगढ़ में चातुर्मास के लिए विराजित आचार्यश्री मृदुरत्न सागर सूरीश्वरजी के केशलोचन करने पहुंचे थे।

आचार्य व गच्छाधिपति जिनके किए केशलोचन

बकौल कोठारी, हर गच्छ के कई गच्छाधिपति व आचार्यों का केशलोचन किया है। प्रमुख रूप से गच्छाधिपति आचार्य शिवमुनिजी, आचार्य मणीप्रभ सागरजी, आचार्यश्री नवरत्न सागर सूरीश्वरजी,गच्छाधिपति अभयदेव सूरीजी बेलावाले, आचार्य जगवल्लभ सूरीजी, दर्षनवल्लभ सूरीजी, चारित्रवल्लभ सूरीजी, आचार्यश्री रत्नसुंदर सूरीश्वरजी, गच्छाधिपति दौलतसागर सूरीश्वरजी, नरदेव सागर सूरीजी, जीनचंद्र सागर सूरीश्वरजी, आचार्यश्री हेमेंद्रसूरीश्वरजी, आचार्य श्री लेखेंद्रषेखर सूरीश्वरजी, दिगंबर समाज के कीर्तिसागरजी, अचल गच्छ के कलाप्रभ सागर सूरीश्वरजी, कलापूर्ण सूरीश्वरजी, जम्बूविजय सूरीश्वरजी, भवनभानू सूरीश्वरजी, रामचंद्र सूरीश्वरजी, कीर्तियश सूरीश्वरजी, योग्यभूषणश्रीजी, लब्धीचंद्र सागरसूरीश्वरजी जैसे दिग्गज साधु-भगवंतों का केशलोचन किया है।

ऐसे मिली प्रेरणा

केशलोच की प्रेरणा के बारे में बताया कि वे 9 वर्ष के थे तब गच्छाधिपति आचार्यश्री देवेंद्रसागर सूरीश्वरजी के सान्निाध्य में उपधान तप किया था। तब कोठारी के पिता ने केशलोच कराया था। कोठारी ने आचार्यश्री से केशलोच की अनुमति मांगी जिस पर आचार्यश्री ने यह कह इंकार कर दिया कि तुम अभी बच्‍चे हो। मैंने 3 वर्ष तक बाल ही नहीं कटवाए। मैं खुद कांच लेकर बैठा और केशलोच करने की प्रक्रिया सीखने लगा। 12 बार केशलोच कर यह कला मैं सीख पाया। कभी किसी की आंखों में केशलोचन की वजह से पानी नहीं आने देता हूं।

शारीरिक कष्ट लेकिन सेवा पहले

कोठारी को रीढ़ की हड्डी में तकलीफ है, जिससे वे आधे घंटे से ज्यादा बैठ नहीं पाते लेकिन वे इसे प्रताप मानते हैं कि जब केशलोचन करते हैं तो सारा दर्द काफुर हो जाता है और वे जटिल प्रक्रिया को संपादित कर देते हैं।