धार। मन को दर्पण कहा गया है। वो मन किसी व्यक्ति का हो या शहर का। मन का दर्पण काला, सफ़ेद, कुरूप, सुंदर हर बात से परे है। वो सिर्फ़ यथार्थ को प्रतिबिंबित करता है। जन्म के बाद मैंने अपनी आंखें धार में खोली हैं। तब से आज पांच दशक का धार से हर कदम का साथ है। इसके हर परिवर्तन के स्पंदन को मन से महसूस किया है। परिवर्तन सामाजिक हो, सांस्कृतिक हो या राजनैतिक।

धार का पूरा गौरव निसंदेह विश्व विजय से अलंकृत है। राजा भोज के ज्ञान और शक्ति के संगम ने धार को अनंत यश दिया है। डा. रघुनाथ कृष्ण राव फड़के साहब द्वारा इस शहर में तराशी हुई प्रतिमाएं यहां की कला की कीर्ति पताका को विश्व में फहरा रही हैं। वे प्रतिमाएं लंदन के बकिंघम पैलस में भी हैं और भारत की संसद के समक्ष भी। लाखों आंखें मुंबई की चौपटी और गेट वे ऑफ इंडिया पर धार की कला को निहारती हैं। ये शहर पद्मश्री के लिए क़तार में नहीं लगा, पद्मश्री यहां उसके पैरों पर चल कर आई है। यहां की रंगोली इतनी जीवंत होती थी कि चित्रों की आंखें दर्शक से संवाद करती थीं। यहां संगीत और चित्र कला में भी वो पैमाने दिए हैं, जिससे विश्व स्तर के कलाकार अपनी हैसियत नापते हैं। धार के मन ने पुरातत्व के संसार को हरिभाऊ वाकणकर दिए जिन्होंने लुप्त सरस्वती की खोज की और विश्व विरासत भीमबैठका को प्रगट किया।

यहां के संतों की आभा ने सम्पूर्ण विश्व को दीप्त किया है। अवधूत श्री नित्यानंद हो अखंडानंद या बंदीछोड़ बााबा, सब के तप के ताप ने अनेक प्रतिभाओं को यहां खींचा। भारत में सबसे पहले आने वाले चार सूफ़ी संतों में से एक को इस धरा के पुण्य ने हर साल पहले यहां आमंत्रित किया। आज कितने लोग जानते हैं कि गीता के बाद निष्काम कर्मयोग की विश्व में सर्वाधिक लोकप्रिय पुस्तक ज्ञानेश्वरी के कुछ अध्याय धार के रत्ननगर वर्तमान नटनागरा या काल भेरू के मठों में लिखे गए।

राजा भोज द्वारा रचित चौरासी ग्रंथ वो आधार है जिस पर विश्व के व्याकरण, विज्ञान और चिकित्सा के साहित्य की इमारत खड़ी हुई। यहां की वीथियों में कालिदास और माघ ने चहलकदमी की है। महेश राजा की कविताओं ने रशिया के विश्वविद्यालयों में हिंदी पाठ्यक्रमों में स्थान पाया है। दुबई और पाकिस्तान के कई भव्य मुशायरे यहां की शायरा शांतिसबा की शायरी पर तालियों से गूंजे हैं। कितने लोग जानते है कि दुनिया भर में प्रसिद्धि का शिखर छूने वाली कई क़व्वालियाँ धार में अंडे का ठेला लगाने वाले उस्ताद शायर स्व. इजहार शादानी और उनके चेलों ने लिखी हैं।

संविधान सभा में कालूरामजी वीरूलकर का होना इस देश की नींव में धार का पत्थर होने के समान सम्मान का विषय है। कुशाभाऊ ठाकरे के विचार और कार्य भारत की पूरी राजनीति के केंद्र में हैं।

धार का वर्तमान अनेक प्रश्न लेकर खड़ा है। केवल अतीत की आभा में भविष्य का सफ़र नहीं होता। आज का धार कहीं न कहीं अभावों के प्रभाव में है। वो अभाव हर क्षेत्र में दिखता है। नागरिक अनुशासन हो या सार्वजनिक संस्कार यहां अब कम ही दिखते हैं। बेतरतीब पार्किंग, .गलत दिशा में वाहन चलाना ये सब आम बात है। बड़ी -बड़ी जन हानि और धन हानि होने पर भी इनका कोई नियंत्रक नहीं है। सार्वजनिक स्थानीय परिवहन जैसे नगर सेवा आदि का तो विचार भी इस शहर के नियामकों को नहीं आता है। साढ़े बारह तालाब अब सिर्फ़ कहानी कस्सों में हैं। आज भी यहां प्रवासी पक्षी दूर यूरोप तक से आते हैं। ़फ्लेमिंगो, स्पुनबिल किव या सारस यहां आज भी आकर उन तालाबों को खोजते हैं। विकास खूब हुआ है, पर उसका प्रबंधन निराश करता है। धार के मन का मयूर भी जब बीते कल को देखता है तो नाचने लगता है। आने वाले कल के कुरूप पांव शायद उसकी आंखों से दो अश्रु टपका देते हों।- कवि संदीप शर्मा

- हास्य व्यंग्य के राष्ट्रीय कवि, धार

Posted By: Nai Dunia News Network

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