चार वेदों पर आधारित 84 चौराहों का निर्माण जो हमें यह सांसारिक जीवन के उन 84 योनियों में भटकने के पश्चात प्राप्त होता है, वह उसे प्रदर्शित करता था। प्रत्येक चौराहे की विशेषता थी कि उसके किसी भी कोण से घूम कर वापस उसी मार्ग में स्थित चौराहे पर आया जा सकता था। नगर के आसपास स्थित साढे बारह तालाबों का वर्गीकरण वर्ष के 12 माह और एक अधिकमास को इंगित करता है। तालाबों की संरचना नगर की बसाहट के अनुरूप कुछ इस प्रकार से की गई है जो तलवार की धार की भांति प्रतीत होती है। इसी वजह से इस नगर का नामकरण धारा नगरी के रूप में हुआ है। हालांकि साढे़ बारह तालाबों में नटनागरा, कुंज, मुंज, देवी सागर, लैंडिया, धूप तालाब, हाथी थान,और सिद्धवट (वर्तमान त्रिमूर्ति नगर) तालाबों में से अब मात्र देवी सागर, नटनागरा और मुंज सागर जैसे तालाबों का ही अस्तित्व बचा हुआ है। उनमें से शेष तालाब बसाहट का रूप लेने से अब वे मात्र प्रतीकात्मक ही रह गए हैं। इसके अलावा यहां पर हर एक किलोमीटर अथवा 100 गज की दूरी पर उत्कृष्ट पत्थरों से निर्मित बावडियों व कुंड का निर्माण किया गया था। उनमें मुनीम जी की बावड़ी(नौगांव), धारेश्वर स्थित मलुस्या बावड़ी, झिरन्या बावड़ी, दशहरा मैदान मार्ग पर स्थित फूटी बावड़ी, राजवाड़े की बावडी, चिटनीस चौक की बावड़ी, केवडी कुंड, मतरकुंड, हीराकुंड (कृषि उपज मंडी) शुद्ध शीतल जल के स्रोतों के केंद्र हुआ करते थे। ऐतिहासिक धारा नगरी में प्रवेश के कुल सात द्वार भी थे जो सप्ताह के सात दिनों को दर्शाते थे। हालांकि उनमें से अब उटावद दरवाजा, भंगी दरवाजा, नाहर दरवाजा, नालछा दरवाजा के नाम ही शेष रहकर प्रचलन में हैं। कुछ मार्गो का नामकरण परिवर्तित होने के कारण आम बोलचाल में मौजूद है। देवी सरस्वती के उपासना स्थल के वैभव की अमर गाथा को यहां की माटी ने अपने विभिन्ना काल-अवधियों में जीवंत बना कर कला साहित्य व खेल के मनीषियों से सींचा है।

नगर की पेयजल समस्या का कुछ हद तक निराकरण हुआ है। इसमें कोई दो राय नहीं है किंतु इस पूरे क्षेत्र में रेलगाड़ी के इंतजार में पीढ़ियों की पीड़ा को आज तक कोई भी महसूस नहीं पाया है। अतः इसी विडंबना को धार का भाग्य न समझ कर भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर इस ओर अधिक सार्थक व ठोस प्रयास होंगे तब निश्चित ही धारा नगरी पुनः अपने मास्टर प्लान के अनुरूप सम्राट भोज के नाम को सार्थक कर सकेगी।

बाल मन की कुछ खट्टी मीठी यादें

स्वर्गीय प्रेम गिरीकर दद्दा द्वारा स्थापित विवेकानंद व्याख्यानमाला में अग्रिम पंक्ति में जाकर बैठना व अपने परिवार विशेषकर स्वर्गीय पिता व स्व. बड़े भ्राता के साथ प्रमुख त्योहारों पर पीपलखेड़ा स्थित आश्रम में तथा कुष्ठ रोगियों की बस्ती में प्रति रविवार नारायण सेवा करने की यादें आज भी जीवंत हैं तथा परंपराओं के पालन का प्रयास भी।

Posted By: Nai Dunia News Network

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