कपिल पारिख

मांडू (नईदुनिया न्यूज)। वर्ष 2006 में पर्यटन नगरी मांडू में लोकतंत्र का अजब-गजब रंग देखने को मिला था। पर्यटन नगरी होने के साथ-साथ मांडू इसलिए भी सुर्खियों में रहा, क्योंकि यहां मध्यप्रदेश में पहली बार खाली कुर्सी-भरी कुर्सी के नियम के तहत बीच कार्यकाल में मतदाताओं ने अध्यक्ष को वापस बुलाने के लिए अपने अधिकारों का इस्तेमाल किया था। इसे और भी सुर्खियां मिली, तब रिकाल बहुमत से सफल हुआ और अध्यक्ष को पद से हटना पड़ा। मांडू के बाद इस मामले में जागृति देखने को मिली और प्रदेश के कई अन्य स्थानों पर भी खाली-भरी कुर्सी के तहत चुनाव की स्थिति बनी।

मांडू आदिवासी बहुल नगर परिषद है। यहां के 13 वार्ड और अध्यक्ष का पद अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है। पूर्व में भी अधिकांश अध्यक्ष का पद अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित रहा है। क्षेत्र पिछड़ा हुआ है और लगभग 95 प्रतिशत मतदाता अनुसूचित जाति से आते हैं। निरक्षरता का प्रतिशत भी ज्यादा है। इसके बावजूद भी यहां के जागरूक मतदाताओं ने 2006 में अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए तत्कालीन नगर परिषद अध्यक्ष स्व. मोहन कुमार चंदेश्री को चलते कार्यकाल में रिकाल कर वापस बुला लिया था। यहां उस समय लगभग छह हजार मतदाताओं ने मतदान किया था। इसमें तत्कालीन अध्यक्ष के विपक्ष में अधिक वोट पड़े थे और मोहन कुमार को लगभग 325 वोटों से हार का सामना करने के कारण अध्यक्ष पद छोड़ना पड़ा था।

रोचक हुआ था चुनाव, मतदाता पर्ची पर था कुर्सी पर बैठे अध्यक्ष व खाली कुर्सी का चिन्ह

मांडू का चुनाव प्रदेश सहित पूरे देश में चर्चा का विषय रहा। पहली बार इस तरह के चुनाव को लेकर यहां हुई रोचक घटनाओं को आज भी मतदाता और जिले के लोग याद करते हैं। यहां चुनाव प्रत्याशी नहीं लड़े थे। चुनाव अध्यक्ष को कायम रखने या हटाने के लिए हुआ था। चुनाव चिन्ह भी बेहद रोचक था। मतदाता पर्ची से चुनाव हुए थे, जिसमें दो चुनाव चिन्ह थे। तत्कालीन अध्यक्ष को कायम रखने के लिए कुर्सी पर बैठे अध्यक्ष अर्थात भरी कुर्सी पर मोहर लगाने की और अध्यक्ष को हटाने के लिए खाली कुर्सी पर मोहर लगानी थी। ऐसे में यहां के मतदाताओं ने खाली कुर्सी पर बहुमत से मोहर लगाकर रिकाल को सफल बनाया था।

15 में से 12 पार्षदों ने जताया था अविश्वास

मोहन कुमार चंदेश्री 2002 में नगर परिषद के अध्यक्ष सीधे मतदाताओं द्वारा निर्वाचित हुए थे। यहां सन 2006 में पार्षदों में असंतोष बढ़ा था। 15 में से 12 पार्षदों ने अपने विशेषाधिकार का प्रयोग कर अध्यक्ष को वापस बुलाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था। इसके लिए मतदान में अविश्वास प्रस्ताव सफलतापूर्वक पारित हुआ था। इसके बाद चुनाव आयोग द्वारा यहां खाली-भरी कुर्सी के तहत चुनाव करवाए गए थे।

मांडू ने 18 माह में देखे चार नगर परिषद अध्यक्ष

सन 2006 में मोहन कुमार चंदेश्री नगर परिषद के अध्यक्ष थे, उन्हें जनता द्वारा हटाने के बाद 2006 में ही शासन ने चुनाव होने पर वर्तमान उपाध्यक्ष नन्नाू सरिया को अध्यक्ष की कुर्सी पर बिठाया था। अध्यक्ष के नए चुनाव को एक वर्ष बचा था। चुनाव हुए और यहां भाजपा और कांग्रेस के उम्मीदवारों को धूल चटाते हुए रिटायर्ड प्रिंसिपल नरसिंह सोलंकी ने निर्दलीय तौर पर चुनाव जीत सबको चौंका दिया था। स्व. सोलंकी भी मांडू के इतिहास में पहले निर्दलीय नगर परिषद अध्यक्ष रहे। छह माह के बाद मांडू को फिर से पांच वर्ष के नए चुनाव में उतरना पड़ा। इस बार हीराबाई श्यामलाल गावर अध्यक्ष चुनी गईं। इस तरह मांडू ने 18 महीने में चार नगर परिषद अध्यक्ष देखे। यह भी अपने आप में अनोखी घटना है।

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