कपिल पारीख मांडू

मांडू से पहले अस्तित्व में रहा बूढ़ी मांडू इतिहास के पन्नाों में दफन हो गया है। संरक्षण के अभाव में सदियों पुरानी अनमोल प्राचीन धरोहर उपेक्षित पड़ी है। यहां 250 से भी ज्यादा मूर्तियां, जीर्ण-शीर्ण मंदिरों के अवशेष, खंडहरों प्राचीन घाटों, टूटे शिखरों, प्राचीन दीवारों के साथ आठवीं, नवीं और दसवीं शताब्दियों की राष्ट्रकूट परमार और परिहार कालीन धरोहर टकटकी लगाए अपने उत्थान की राह देख रही हैं। वर्षों बीतने के बाद भी आज तक यहां पहुंचने के लिए सड़क तक नहीं बन पाई है। बूढ़ी मांडू के हालात देखकर प्राचीन धरोहरों को सहेजने के दावे खोखले नजर आते हैं।

सुनसान पहाड़ियों से घिरे इस स्थान पर इतिहास बिखरा पड़ा हुआ है। 13वीं शताब्दी में प्रतिहारों के राज में मांडू से लगे सोड़पुर के निकट बने जंगल में बूढ़ी मांडू में अभी भी शिवलिंग गणेश मूर्तियां सहित कई धरोहर लावारिस अवस्था में पड़ी हैं, जिन्हें समय रहते संरक्षित किया जा सकता है।

धार किले और मांडू में रखी बूढ़ी मांडू की 204 मूर्तियां

1988 में बूढ़ी मांडू में अस्तित्व खो रहे मंदिर के अवशेष और मूर्तियों को धार के ऐतिहासिक किले, मांडू के 56 महल और जहाज महल संग्रहालय में संरक्षित करने के लिहाज से रखा गया है। उसके बाद आज तक बूढ़ी मांडू के संरक्षण की दिशा में कोई कवायद नहीं हुई। फिलहाल धार जिले में रखी मूर्तियां भी टूट रही हैं। केमिकल ट्रीटमेंट के तहत उन्हें संरक्षण देने का प्रयास किया जा रहा है, पर सफलता नहीं मिल रही है। इतिहासकार योगेंद्र परिहार के अनुसार एकांत और शांत स्थान होने के कारण यह परमार काल में साधना और आराधना का केंद्र रहा है। इस स्थान को लेकर किवंदती है कि शक्ति स्वरूपा माता ने ओंकारेश्वर से लेकर महाकालेश्वर तक की यात्रा की थी। उस समय उनकी बिंदी का अंश बूढ़ी मांडू क्षेत्र में गिरा था। तभी से यहां पर आराधना स्थली का विकास हुआ है।

विसारा आर्किटेक्ट के बेहतरीन नमूने बूढ़ी मांडू के वास्तुशिल्प

बूढ़ी मांडू की वास्तुकला पर काम कर रहे प्रसिद्ध आर्किटेक्ट इसान नातू ने बताया कि बूढ़ी मांडू का इतिहास पांचवीं शताब्दी से देखने को मिलता है, पर प्रमाणित इतिहास के अनुसार यहां राष्ट्रकूट, परमार और परिहार वंश का राज्य था। यहां के वास्तुशिल्प की खासियत ये हैं कि ये द्रविड़ियन यानी दक्षिणी भारत और उत्तर भारत की वास्तुकला के संगम का बेहतरीन नमूना है, जिसे विसारा आर्किटेक्ट कहते हैं। वास्तु की यह शैली कम स्थानों पर ही देखने को मिलती है। उनका मानना है कि यहां सदियों पुराना इतिहास बिखरा हुआ है। अगर सही दिशा में काम हो तो नष्ट होती धरोहर को सहेजा जा सकता है। तात्कालिक तौर पर मूर्तियों को सुरक्षित कर चोरी होने से बचाने के प्रबंध के साथ ट्रैकिंग मार्ग विकसित करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

उपेक्षा की हद... जाने के लिए सड़क तक नहीं

बूढ़ी मांडू के संरक्षण के प्रति पुरातत्व विभाग लापरवाह है। विभाग ने इस प्राचीन धरोहर को सहेजने की दिशा में कोई प्रयास नहीं किए। शासन और प्रशासन ने भी इस ओर कभी ध्यान नहीं दिया। हालत यह है कि वर्षों बीतने के बाद भी यहां तक पहुंचने के लिए सड़क नहीं है। धरोहरों को सुरक्षित करने की दिशा में भी अब तक किसी प्रकार की कोई योजना नहीं बनी है। वर्तमान में मांडू से 10 किलोमीटर पहले नालछा से पूर्व की ओर 18 किलोमीटर सफर करने के बाद सोडपुर, मोगराबाव होते हुए बूढ़ी मांडू पहुंचा जा सकता है ।

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बूढ़ी मांडू में सक्रिय तस्कर, मूर्तियां हो रही चोरी

नईदुनिया ने जब बूढ़ी मांडू के आसपास के ग्रामीणों से बात की तो बड़ी बात सामने आई। क्षेत्र के लोगों ने बताया कि बूढ़ी मांडू में फिलहाल जो मूर्तियां और अवशेष हैं, चोरी हो रही है। पुरातत्व विभाग और प्रशासन के लोग यहां झांकने तक नहीं आते। जानकारों के अनुसार यहां से चोरी मूर्तियां देश-विदेश में मोटी राशि में बिकती हैं। आसपास के जंगल भी तेजी से कट रहे हैं।

हमारे संरक्षण में नहीं, वन विभाग लगा रहा अड़ंगा

बूढ़ी मांडू का क्षेत्र वन विभाग के अधीन आता है। पूर्व कलेक्टर आलोक सिंह के साथ पुरातत्व विभाग के अधिकारियों ने मार्ग निर्माण के प्रयास किए थे, पर वन विभाग ने मार्ग बनने नहीं दिया। बूढ़ी मांडू फिलहाल आधिकारिक तौर पर हमारे विभाग के संरक्षण में नहीं है। अगर वन विभाग अनुमति दे तो यह बड़ा पर्यटन केंद्र बन सकता है। संरक्षण के लिए हम अपने स्तर पर प्रयास कर रहे हैं। मूर्तियां चोरी होने की बात है तो हमें ऐसा नहीं लगता।-डीके पांडे, संग्रहालय अध्यक्ष, राज्य पुरातत्व विभाग धार

Posted By: Nai Dunia News Network

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