प्रेमविजय पाटिल, धार

कोरोना वायरस संक्रमण काल में तपेदिक यानी टीबी प्रोग्राम बहुत बुरी तरह से प्रभावित हुआ। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि धार जिले से लेकर संभाग में 2020 में उपलब्ध कराई गई टु्‌नाट मशीन का उपयोग कोविड जांच में किया गया। इसी का परिणाम यह रहा कि एमडीआर टीबी के मरीजों की संख्या 65 प्रतिशत तक घट गई। इस कारण कई लोगों की मौत हुई। अब इन सभी मरीजों को नए प्रोग्राम से जोड़कर उनकी खोज करने का काम किया जा रहा है।

गौरतलब है कि आदिवासी बहुल धार, झाबुआ व आलीराजपुर जिले की तपेदिक बीमारी के तहत चिंताजनक स्थिति हमेशा बनी रहती है। वैसे भी मध्य प्रदेश देश में तपेदिक बीमारी के मामले में संवेदनशील प्रदेशों में से एक है। इस तरह की स्थिति होने के बावजूद यहां कोविड-19 की परिस्थितियों में 68 मशीनों का उपयोग करीब 15 माह तक सिर्फ कोविड-19 की जांच के लिए किया गया। इससे करीब तीन लाख 67 हजार जांच होने की संभावना समाप्त हो गई। एक मशीन से लगभग प्रतिदिन औसत रूप से 12 जांच हो सकती है। ऐसे में बहुत बड़ी समस्या यह है कि टीबी प्रोग्राम बुरी तरह से प्रभावित हुआ। सबसे बड़ी चिंता का विषय यह था कि इस दौरान एमडीआर यानी मल्टीड्रग रेजिस्टेंस श्रेणी की टीबी की जांच बुरी तरह से प्रभावित हो गई। बता दें कि जो मशीन उपलब्ध कराई गई थी वह इसलिए उपलब्ध करवाई गई थी कि तपेदिक बीमारी में गुणवत्ता युक्त जांच हो सके। वह गुणवत्ता की जांच नहीं हो पाई। जिलों की बात करें तो यहां पर केवल 40% एमडीआर टीबी के मरीजों का पता लगाया जा सका। वह भी बड़े शहरों में। हालांकि शुरुआत के एक साल तो एमडीआर की स्थिति और भी चिंताजनक रही।

-इन तीन जिलों में एमडीआर टीबी के मरीजों की संख्या 400 से अधिक रहनी थी, लेकिन वह केवल 10 से 20 रह गई। इस तरह से चिंताजनक स्थिति बनी।

नौ साल की बेटी की हुई मौत

इन परिस्थितियों को हम इस तरह से समझ सकते हैं कि मशीन की उपलब्धता नहीं होने के कारण कितनी बड़ी समस्याएं हुई। हाल ही में एक उदाहरण सामने आया है कि कुक्षी क्षेत्र की नौ वर्षीय बच्ची को टीबी की बीमारी हुई और उसका पता समय पर नहीं चल पाया। जब बीमारी पता चली तो उसकी गुणवत्तायुक्त जांच उपयुक्त मशीनों से नहीं हो पाई। उसी का नतीजा यह रहा कि उस बच्ची को एमडीआर टीबी हो चुकी थी। यानी सामान्य टीबी से अधिक गंभीर श्रेणी की टीबी हो चुकी थी। उस बच्ची ने करीब तीन माह के बाद दम तोड़ दिया। इस तरह का यह एक उदाहरण नहीं है बल्कि आदिवासी बहुल जिलों में इस तरह से करीब 144 मौतों की जानकारी सामने आई है। जो अपने आप में एक गंभीर आंकड़ा है। एमडीआर टीबी के बारे में इस तरह की स्थिति होना अपने आप में गंभीर बात है।

सीबी नाट मशीन का भी उपयोग हुआ

टीबी की जांच में न केवल टुनाट मशीन का उपयोग हुआ बल्कि सीबी नाट मशीन का भी उपयोग किया गया। ऐसे में मरीजों की संख्या को पता करने में काफी दिक्कत हुई। टीबी नियंत्रण कार्यक्रम में मैदानी स्तर पर सेवा देने वाले विशेषज्ञों की मानें तो एमडीआर टीबी के पेशेंट 65% तक घट गए। यह अपने आप में चिंता का विषय है। 2025 तक अभी हमें टीबी का उन्मूलन करना है तो इस तरह की परिस्थिति में हम काम नहीं कर सकते हैं। हालांकि अब सारी मशीनें टीबी कार्यक्रम के लिए उपलब्ध करा दी गई हैं।

मध्य प्रदेश में 296 मशीनें नहीं उपलब्ध कराई गईं। कोविड-19 के दौरान जो 68 मशीनें उपलब्ध कराई थीं, वे भी अब सेंटरों पर उपलब्ध करा दी गई हैं। बता दें कि प्रत्येक विकासखंड मुख्यालय पर एक मशीन उपलब्ध करा दी गई है। अब जांच का कार्य शुरू हो चुका है। चिंता का विषय है कि जो डेढ़ साल तक जांच के मामले में कमजोरी रही, उसे अब रिकवर करना बहुत मुश्किल है। उसके लिए व्यापक स्तर पर काम नहीं हो पा रहा है। जब तक यह जांच का व्यापक स्तर पर काम नहीं हो पाएगा तब तक दिक्कत बनी रहनी है।

अब क्या हो रहा

-दरअसल अब टीबी कार्यक्रम के तहत राज्य सरकार ने ऐसे परिवार जहां पर लोगों को टीबी हुई है, वहां हर छह महीने में जांच करने के लिए व्यवस्था की है। मध्य प्रदेश में इसके लिए बकायदा एक आदेश जारी कर दिया गया है। इससे कि वहां पर किसी तरह की परेशानी नहीं हो। दूसरी ओर यह भी बात सामने आ रही है कि जिन लोगों के परिवार में किसी एक सदस्य को भी टीबी की बीमारी है तो टीबी प्रिवेंशन थैरेपी के तहत विशेष रूप से कार्य कर रहे हैं। परिवार के हर सदस्य की जांच कर कर निर्धारित दवा उपलब्ध कराई जा रही है। इससे कि उन्हें टीबी होने से बचाया जा सके।

सामाजिक रूप से कई समस्याएं विद्यमान

इस संबंध में सामाजिक कार्यकर्ता जीआर मुद्गल ने बताया कि यह सामने आया कि टीबी से कोरोना संक्रमण काल में बड़ी संख्या में मौत हुई है। हालांकि अभी तक आंकड़ा स्पष्ट नहीं हो पाया है लेकिन बुनियादी तौर पर देखें तो एक चिंताजनक है। उन्होंने कहा कि हमारे यहां पर अभी भी सामाजिक रूप से कई तरह की समस्याएं हैं। टीबी नियंत्रण कार्यक्रम को विशेष रूप से संचालित किया जाए। उसमें हर आदमी का योगदान हो। सर्ववाइवर अगेंस्ट टीबी जैसी संस्था के माध्यम से मरीजों को जागरूक किया जा रहा है।

अब सभी ब्लाक स्तर पर मशीनें पहुंच चुकी हैं। कोरोना काल में तो मशीनें कोविड कार्यक्रम में लगी थीं। कोरोना काल में टीम ने बेहतर काम किया। दवाएं समय पर मरीजों को पहुंचाई गई है। -डा. संजय जोशी, जिला टीबी अधिकारी, धार

Posted By: Nai Dunia News Network

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