प्रेमविजय पाटिल, इंदौर। मध्य प्रदेश के धार जिले के छोटे से कस्बे सरदारपुर की शिक्षिका शिरीन कुरैशी भगवान श्रीराम और रामायण को लेकर अनूठा काम कर रही हैं। शिरीन मुस्लिम मतावलंबी हैं, किंतु श्रीराम और रामायण के लिए उनके मन में अगाध श्रद्धा है। शिरीन ने श्रीलंका में करीब चार वर्ष तक प्रतिनियुक्ति पर बतौर हिंदी शिक्षक अपनी सेवाएं दीं। इस दौरान वहां सीताजी के मंदिर से लेकर अन्य कई संबंधित स्थानों को देखा। इससे श्रीराम, सीता और रामायण के बारे में उनकी रुचि जागृत हुई। श्रीराम-सीता पर अध्ययन से यह भाव जागा कि सीता विरह पर पुस्तक लिखना चाहिए। बस वहीं से वे भगवान श्रीराम और सीताजी से जुड़ गईं। शिरीन अब तक श्रीराम और रामायण पर आधारित मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में प्रचलित 200 से अधिक लोकगीत व स्वरचित गीतों का संग्रह कर चुकी हैं।

शिरीन के इस अनूठे कार्य को देखते हुए मुंबई की साहित्यिक-सांस्कृतिक शोध संस्था ने उनसे संपर्क किया और उन्हें संस्था का मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ का उपनिदेशक बनाकर एक विशेष अभियान से जोड़ा। संस्था भगवान श्रीराम पर आधारित अलग-अलग प्रसंगों के 26 खंड तैयार कर रही है। श्रीराम से जुड़े लोकगीतों पर आधारित पहला खंड 'लोकगीतों में राम" तैयार होकर प्रकाशन के लिए जा चुका है, जबकि दूसरे खंड 'भजन कीर्तन में राम" का कार्य अंतिम चरण में है। फरवरी में इसके तीसरे खंड 'सिनेमा में राम" का कार्य शुरू होगा।

सीता विरह प्रसंग ने खींचा ध्यान

शिरीन बताती हैं कि रामायण के अध्ययन के दौरान उन्हें सीता विरह का प्रसंग सबसे महत्वपूर्ण लगा। सीता शक्ति-स्वरूपा हैं, फिर भी एक देवी ने किस तरह एक सामान्य महिला बनकर कठिनाई में अपनी रक्षा की और एक महिला के सम्मान को ऊंचाई प्रदान की, यह उनके व्यक्तित्व से सीखा जा सकता है। शिरीन कहती हैं कि मैं छह साल से राम व रामायण प्रसंग के लिए कार्य कर रही हूं और मुझे इसमें काफी आनंद व शांति की अनुभूति होती है। श्रीलंका में अशोक वाटिका है। उसे देखकर कल्पना की जा सकती है कि सीता माता ने कैसी कठिन तपस्या की होगी। शिरीन का अब लक्ष्य है कि सीता विरह पर किताब लिखें। बता दें कि श्रीलंका जाने के लिए उनका चयन भारतीय दूतावास के माध्यम से हुआ था। वे वर्ष 2014 से 2018 के बीच वहां रहीं।

इनका कहना है

शिरीन बहुत अद्भुत कार्य कर रही हैं। वे बुंदेलखंड और छत्तीसगढ़ के कई इलाकों से ऐसे गीत संकलित कर चुकी हैं, जो बहुत ही विशेष हैं। राम की सेवा में काम का ऐसा उत्साह प्रशंसनीय है।

- प्रदीप कुमार सिंह, साहित्यिक-सांस्कृतिक शोध संस्था, मुंबई

Posted By: Hemant Kumar Upadhyay

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