प्रेमविजय पाटिल, धार

भारत छोड़ो आंदोलन में धार का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं कानून के विद्वान कालूराम विरूलकर की अध्यक्षता में 10 अगस्त 1942 को ही करो या मरो का नारा धार में दिया दे दिया गया था। इसके चलते उग्र आंदोलन प्रारंभ किया था। स्थानीय राज्य को चेतावनी दी गई कि अंग्रेजों से नाता थोड़े और जनता का उत्तरदायी शासन स्थापित करें। तत्कालीन महाराजा द्वारा उदार दृष्टि से कांग्रेसी नेताओं से चर्चा की गई और जनता की मांग को स्वीकार भी करने का आश्वासन दिया। इधर धार राज्य लोक परिषद को गैरकानूनी घोषित कर दिया था। इसमें विरूलकर सहित नेताओं की सनद 1942 में रद्द कर दी गई थी। ऐसे में सब कुछ छोड़कर अपनी पूरी शक्ति के साथ उस समय भारत छोड़ो आंदोलन में कूद पड़े।

राज्यभर में दिन-रात दौरे कर जनजागृति आंदोलन चलाया गया। इस आंदोलन के फलस्वरूप विरूलकर को अपने अन्य साथी नेताओं के साथ जेल में जाना पड़ा। करीब तीन माह बाद उन्हें जेल से रिहा किया गया। विरूलकर ने आंदोलन को जारी रखते हुए राज्य प्रजामंडल की स्थापना की। वर्ष 1944 में महान क्रांतिकारी पंडित सुंदरलाल को धार में आमंत्रित कर उनकी एक महत्वपूर्ण सभा कार्रवाई। धार प्रजामंडल का सहयोगी बना।

खलघाट में हुआ था अधिवेशन

प्रजामंडल का अधिवेशन 1944 में खलघाट में हुआ था। इसमें अखिल भारतीय राज्य परिषद के अध्यक्ष डाक्टर पट्टाभि सीतारमैया प्रमुख वक्ता के रूप में उपस्थित थे। 1946 में उत्तरदायी शासन की मांग के साथ शराबबंदी के लिए धरना आंदोलन व असहयोग आंदोलन प्रारंभ किया। आंदोलन की सफलता को देखते हुए धार के तत्कालीन राजा ने विरूलकर एवं प्रजामंडल के अन्य तीन नेताओं को बुलाकर सम्मान के साथ चर्चा की। साथ ही उत्तरदायी शासन की प्रस्तावना भी रखी। इस तरह से भारत छोड़ो आंदोलन में धार के स्वतंत्रता सेनानियों का भी अपना महत्वपूर्ण योगदान रहा।

संविधान निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई

बता दें कि कालूराम विरूलकर का जन्म 13 जून को पश्चिम निमाड़ के ग्राम ठीकरी में सुखलाल कानूनगो के घर हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा ग्राम ठीकरी में हुई। धार में आनंद कालेज में उन्होंने एडमिशन लिया। होलकर कालेज इंदौर से एलएलबी की उपाधि 1938 में प्राप्त की। हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी से बीए 1935 किया था। एमए राजनीति विज्ञान में उपाधि 1940 में ली। विरूलकर को भारतीय संविधान निर्मात्री सभा का सदस्य बनाया गया था। 1948 में केंद्र में डा. राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में भारतीय संविधान निर्मात्री सभा का गठन किया गया था। इसमें उन्होंने मध्य भारत की ओर से सदस्य के तौर पर लगातार तीन वर्ष काम किया और संविधान निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संविधान के पार्ट बी स्टेटस के चैप्टर को संविधान में शामिल करवाने में उनका महत्व योगदान रहा। देश की आजादी के बाद जब मध्य भारत का गठन हुआ तो मध्य भारत राज्य में 1948 में होने पहले मंत्रिमंडल में राज्य शिक्षा मंत्री बनाया गया। वे करीब 5 वर्ष तक इस पद पर रहे, लेकिन बाद में वैचारिक मतभेदों के कारण मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया था।

विमान में आजीवन मुफ्त भ्रमण की सुविधा थी

बता दें कि उन्हें गोल्डन ट्रिब्यूट कार्ड इंडियन एयरलाइंस की ओर से दिया गया था। इसके तहत उन्हें इंडियन एयरलाइंस के विमानों में भारत में निश्शुल्क यात्रा की आजीवन सुविधा दी गई थी। 6 अक्टूबर 1997 को दिल्ली में भारत शासन के नागरिक उड्डयन मंत्री सीएम इब्राहीम ने संविधान निर्मात्री सभा के 15 सदस्यों का सम्मान किया था, उसमें वे भी शामिल थे।

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