-ग्वालियर रियासत के महाराज 18 घोड़ों की चांदी की बग्गी में दशहरा में हाथी-घोड़ों के साथ शाही अंदाज में निकलते थे

ग्‍वालियर.नईदुनिया प्रतिनिधि। विजय दशमी के पर्व समूचे देश अपनी-अपनी परंपराओं व रिवायत के अनुसार मनाया जाता है। दशहरा पर देशभर में दशहरा के चल समारोह आजादी के पहले भी निकलते थे, अब भी निकलते हैं। मैसूर में निकलने वाले दशहरा को देश-विदेश के लोग देखने के लिए आते थे। दशहरा के चल समारोह का शाही अंदाज होता था। मैसूर के बाद दशहरा निकलने के बाद किसी का नाम लिया जाता है, तो वह ग्वालियर का। रियासत में काल में यहां भी शाही सवारी के साथ दशहरा निकलता था। ग्वालियर रिसायत के महाराज 18 घोड़ों की चांदी के बग्गी में सवार होकर अपनी प्रजा से दशहरा मिलने के लिये निकलते थे। सिंंधिया की फौज के साथ हाथी-घोड़े दशहरा के चल समारोह में निकलते थे।

एक महीने पहले से तैयारी शुरू हो जाती थीं

झांसी से आये कन्हैयालाल कुशवाह ने बताया कि मोतीमहल में चित्रकारी के लिये ग्वालियर रिसायत के तत्कालीन महाराज ने बुलाकर यहां माधवगंज के पास बसाया था। दिवारों पर चित्रकारी का काम होने के के कारण इस गली का नाम ही चितेरा ओली पड़ गया। मूर्तिकार व चित्रकार ने बताया कि ग्वालियर में एक महीने पहले से दशहरा की तैयारी शुरू हो जाती थी। हमारा परिवार दशहरा के चल समारोह में निकलने वाले हाथी-घोड़ों के वाटर पेंट के साथ सजाते थे। हाथियों की सूड़ से माथे पर, आंखों की भौंहे आसपास चित्रकारी की जाती थी। दशहरा नगर में पूरे शान के साथ निकलता था। महाराज बाड़े पर दशहरा देखने के लिए भारी भीड़ होती थी।

दशहरा चल समारोह जयविलास पैलेसे के थीम रोड के गेट से शुरू होता था- रियासत काल में ग्वालियर के तत्कालीन महाराज चांदी की बग्गी में सवार होते थे। महाराज अपनी राजशी पौशाक में होते थे। आगे हाथी घोड़े, पैदल सैनिक चलते थे। राजघराने के सरदार भी अपने औहदे के अनुसार चल समारोह में शामिल होते थे। सबसे पहले महाराज कुल देवी के मंदिर मांढरे के माता के मंदिर पहुंचते थे। जहां कुल देवी के दर्शन करने के बाद शमी पूजन करते। और शमी के पेड़ में तलवार मारकर शमी की सुनहरी रंग से रंगी पत्तियां लूटते थे। उसके बाद चल समारोह महाराज बाड़े पहुंचता था। यहां महाराज बग्गी से उतरकर हाथी पर सवार हो जाते। यहां से देवघर गोरखी दर्शन करने के लिये जाते थे। उसके बाद चल समारोह महल वापस लौटता। शहर में उत्सव जैसा माहौल रहता था। दूसरे दिन दरबार सजता। सरदार व नगर के व्यापारी दरबार में उपस्थित होकर महाराज को दशहरा की शुभकामनाएं देते थे।

आज भी परंपरा का निर्वहन होता- पहले जैसे अब शाही दशहरा तो नहीं निकलता हैं, लेकिन सिंधिया राजपरिवार का मुखिया आज भी राजशी मराठी पौशाक में अपने सरदारों के साथ कुल देवी के दर्शन करने के लिये मांढरे की माता जाते हैं। और उसके बाद शमी पूजन कर सुनहरी रंग की रंगी पत्तियां सोने के प्रतिस्वरूप में लूटाते हैं। उसके बाद देवघर गोरखी भी दर्शन करने के लिये जाते हैं।

Posted By: anil tomar

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