ग्वालियर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। जिनके साथ आजादी की लड़ाई लड़ी। घर परिवार की तरह खाना,पीना व रहना था। वही लोग अचानक से एक दिन जान के दुश्मन बन गए। तब मजबूरन अपनी जन्म भूमि रसीदपुर पाकिस्तान से जान बचाकर भागना पड़ा। सबकुछ जैसा था वैसा ही छोड़कर मैं अपनी छह साल छोटी बहन व माता पिता के साथ निकल आया। लेकिन रास्ते में मेरे पिता का देहांत हो गया और मेरे सिर से पिता का साया भी छिन गया। ग्वालियर आकर बेलदारी की, फल का ठेला लगाया फिर वाहन सुधारने की दुकान डाली तब मैंने अपने परिवार को पाल सका । आंखों में देश के बंटवारे का दर्द छलकाते हुए हनुमान नगर निवासी 95 वर्षीय रामस्वरूप नागपाल ने कही। उन्होंने बताया कि देश के बंटवारे का दर्द उन्होंने व उनके परिवार, रिश्तदारों ने कैसे झेला। जो लोग समय से नहीं भाग सके उन लोगों को मुस्लिमों ने मार दिया। उनकी औरतों और धन-संपत्ति को लूट लिया। आजादी के बाद जो मंजर देखा उससे तो अच्छी अंग्रेजों की गुलामी थी।

आजादी की खुशी तक न मना सके : आजादी मिली तब मेरी उम्र 20 वर्ष थी और मैं उस वक्त अपने नाना के घर था। आजादी मिली तो उसकी खुशी मनाई गई, पर बंटवारे से खुशी गम में बदल गई। सरदार बल्लभ भाई पटेल ने कहा कि पाकिस्तान में रहने वाले सभी हिन्दू हिन्दुस्तान वाले क्षेत्र में आए और मुस्लिम पाकिस्तान जाएं। झंग में सेना तैनात कर कैंप लगाया गया और मुनादी कराई गई कि हिन्दू अपना सामान लेकर निकलें। मेरा पूरा गांव एक साथ खाली हो गया और झंग से मालगाड़ी में बैठा दिया । ट्रेन के ऊपर बैठकर सफर किया रास्ते में एक पुलिया आई जिससे टकरा कर पिता का देहांत हो गया। जिनका अंतिम संस्कार कुरुक्षेत्र में किया। कुरुक्षेत्र में कैंप लगा था जिसमें ग्वालियर के महाराजा पहुंचे थे उन्होंने सभी से कहा कि ग्वालियर चलो मैं वहां पर व्यापार दूंगा। जिसके बाद हम सभी ग्वालियर आ गए और यहां पर मेला ग्रांउड में ढेरा डाल दिया। फालका बाजार में स्थित हम्मालों का पूरा मोहल्ला मुसलमानों का था, जो अपने घर खाली कर जा चुके थे। इन घरों को कस्टोडियन विभाग ने पाकिस्तान से आने वालों को रजिस्ट्री की थी। हम्मालों का मोहल्ला आज हनुमान नगर के नाम से जाना जाता है।

मुस्लिमों के हमलों से बचाने बहन बेटियों को मार दिया था

बंटवारे में जो भी हिन्दू पाकिस्तान से आए थे उन्हें भारत सरकार ने जमीन दी थी। मुझे हिसार के दाणीरामजस गांव में 20 बीघा जमीन मिली थी। जब फौज हिन्दुओं को पाकिस्तान से निकाल रही थी उसी समय पंडित नेहरू व महात्मा गांधी का एक वक्तव्य आया कि जो हिन्दू व मुस्लिम जहां रहना चाहता है वह रह सकता है। तब नानकसर शहर में कुछ हिन्दू /पंजाबी/परिवार रुक गए। वहां पर मेरे रिश्तदेार रहते थे। बाद में पता चला कि जो परिवार ठहर गए थे उन पर मुसलमानों ने हमला किया और मार दिया।

मिलजुलकर रहते थे हिन्दू मुस्लिम

रामस्वरूप नागपाल को चलने फिरने के लिए बाकर का सहारा लेना पड़ता है। श्री नागपाल ने बताया कि पंजाब प्रांत के रसीदपुर जिला झंग में मेरा परिवार रहता था। यह जगह आज पाकिस्तान में है। रसीदपुर में 90 फीसद हिन्दू आबादी थी जो कपड़ा का व्यापार करने के लिए ग्वालियर, भोपाल व जबलपुर तक आते थे। खेतीबाड़ी अच्छी थी लेकिन उसे जुताई पर मुस्लिम करते थे जो रसीदपुर व उसके आसपास छोटे-छोटे गांव में रहते थे। गांव में हिन्दू मुस्लिम मिलजुलकर रहते थे आपस में बड़ा प्रेम था। आजादी के लिए जुलूस निकलते थे। मुस्लिम वर्ग मुस्लिम लीग को सपोर्ट करता था और हिन्दू कांग्रेसी थे।

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