नईदुनिया ग्वालियर के संपादकीय प्रभारी वीरेंद्र तिवारी का रविवारीय काॅलम

अन्नदाता के प्रति संवेदनशील रहिए

मरता है तो मरने तो कोई सुशांत थोड़ी है, उजड़ते हैं खेत खलियान उजड़ने दो कंगना का मकान थोड़ी है। यह पक्तियां किसानों के आंदोलन पर हुक्मरानों को आइना दिखाने के लिए खूब वायरल हो रही हैं। जब मोटी तनख्वाह पाने वाले सरकारी कर्मचारी काम ठप कर मैदान में कूद जाते हैं, जब आरक्षण के लिए रेल यातायात जाम कर दिया जाता है तो ऐसा क्यों हो रहा है कि हम अन्नादाता को यह विश्वास नहीं दिला पा रहे हैं कि उसकी फसल का गारंटेड दाम उसे मिलेगा। इतिहास में कितनी बार आपने सुना है कि पूरे देश में एक साथ किसानों ने संगठित होकर आंदोलन किया हो। नहीं करते बेचारे। कर भी नहीं सकते। खेत खलियान की ही इतनी समस्याएं होती हैं सड़क पर उतरने का समय ही नहीं मिलता। अब यदि मुट्ठी भर किसान सड़क पर आए भी हैं तो उनकी समस्याएं तुरंत सुनी जानी चाहिए।

अकूत संपत्ति के प्लानर

जिसके कंधे पर शहर के सुनियोजित विकास का जिम्मा हो वही एक-एक अवैध निर्माण के एवज में 50 लाख रुपये की वसूली करते रंगे हाथों पकड़ लिया जाए तो उस शहर का बेड़ा गर्क होना तय है। हालांकि प्रदेश के लगभग हर निगम का हाल यही होगा। नगर निगम का नाम आते ही एक छवि पूरे दिल ओ दिमाग में छा जाती है। वहां पहुंचते ही लगता है कि जैसे किसी दूसरी दुनिया में आ गये हैं। जहां पैसा ही संविधान है, पैसा ही ईमान है और पैसा ही भगवान है। निगम की कुछ शाखाएं तो काजल की कोठरी से भी अधिक बदनाम हो चुकी हैं। ग्वालियर में सिटी प्लानर के साथ ही निगम के कुछ बड़े अधिकारियों के किस्से आम थे। लेकिन किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा। क्योंकि यहां हर कुर्सी अपने आप में सिस्टम होती है। सरकारें बदल जाती हैं लेकिन सिस्टम नहीं।

माफिया और मंशा

बताते हैं कि ग्वालियर के पुलिस और प्रशासन के आला अफसरों को रात दिन माफिया माफिया के सपने ही आ रहे हैं। भोर होते ही इस की चिंता होने लगती है कि आज कहां तोड़फोड़ कर एक दिनी जमानत ले लें। हो भी क्यों न भोपाल दरबार को रिपोर्ट जो भेजना होती है। वैसे तो माफिया अभियान पूरे प्रदेश में शुरू हुआ है लेकिन दबाव सर्वाधिक ग्वालियर पर है। दरअसल जब से उपचुनाव में ग्वालियर अंचल में कांग्रेस ने सत्ताधारी दल से अधिक सीटें जीतकर भाजपा की किरकिरी की है तब से चुन चुनकर माफिया तलाशे जाने लगे हैं। कांग्रेस के विधायकों की तो पूरी कुंडली बनाने में संतरी से लेकर अफसर तक जुटे हुए हैं। अभी तक की कार्रवाई देखने पर लगता तो नहीं है कि आम जनता को इसका कोई लाभ मिलेगा। हां यदि गुंडों, मिलावट खोरों पर प्रशासनिक डंडा चले तो कुछ बात बने।

गोविंद तेरो है...

राजनीति का दूसरा नाम गुटबाजी ही होना चाहिए। अंचल में वैसे ही कांग्रेस वेंटिलेटर पर है फिर भी पार्टी की गुटबाजी खत्म ही नहीं हो रही है। अब देखिए जिस कमल-दिग्गी की जुगलबंदी के चलते ज्योतिरादित्य सिंधिया ने सरकार गिराकर भाजपा का दामन थाम लिया वही जोड़ी नेता प्रतिपक्ष पद को लेकर अप्रत्यक्ष रूप से आमने सामने आ गई है। टकराव इतना होने लगा है कि अब चंबल के बड़े कांग्रेस नेता पूर्व मंत्री गोविंद सिंह को ही किनारे करने की पटकथा लिख दी गई। अंचल में कांग्रेस का उपचुनाव में उम्दा प्रदर्शन के बाद दिग्गी खेमे के गोविंद सिंह नेता प्रतिपक्ष के तगड़े दावेदार होकर हैं वहीं पूर्व सीएम इंदौरी सज्जन को कुर्सी सौंपना चाहते हैं। फिलहाल गोविंद के वनवास का प्रस्ताव सोनिया दरबार में लंबित है। अब देखते हैं प्रदेश के दो बड़े ध्रुवों की अंदरुनी लड़ाई को मेडम कैसे शांत करती हैं।

Posted By: vikash.pandey

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