ऐसे बने 60 के पार केअभय चौधरी जिलाध्यक्ष, अध्यक्ष बदलते ही बदलेंगे समीकरण

ग्वालियर(नईदुनिया प्रतिनिधि) भाजपा नेतृत्व ने ही तय किया था कि पार्टी में नये चेहरे लोगों को सामने लाने के लिये जिलाध्यक्ष 50 वर्ष के ऊपर नियुक्त नहीं किया जायेगा। जिले का अध्यक्ष बदलने के लिये मंथन महापौर चुनाव के नतीजों के बाद से शुरू हो गया था। प्रदेश कार्यसमिति की बैठक से पहले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा, केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, ज्योतिरादित्य सिंधिया व संगठन महामंत्री हितानंद शर्मा की ग्वालियर के अध्यक्ष पद के लिये नाम तय करने के लिये वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से चर्चा की। नरेंद्र सिंह तोमर जिला उपाध्यक्ष रामेश्वर भदौरिया का यह कहकर नाम को आगे बढ़ाया कि सबकों साथ लेकर चलने की क्षमता के साथ पार्टी की उम्र की 50 से 52 वर्ष की गाइड लाइन में फिट बैठते हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने वेद प्रकाश शर्मा के नाम को आगे बढ़ाते हुये कहा कि इस समय जिले को अनुभवी व्यक्ति की जरूरत है।

जिलाध्यक्ष पद पर किसी अनुभवी व्यक्ति को बनाये जाने पर सभी सहमत थे। इस पर नरेंद्र सिंह ने कहा कि अभय चौधरी तीन बार अध्यक्ष पद के साथ जीडीए के अध्यक्ष पद का दायित्व संभाल चुके हैं। उनके कार्यकाल में चुनावों में पार्टी अपेक्षा के अनुरूप नतीजे हासिल हुये हैं। इस तरह से अभय चौधरी के नाम सहमति बनाकर प्रदेश नेतृत्व ने अध्यक्ष बनाये जाने की घोषणा 57 साल के इतिहास में पहली बार महापौर चुनाव में पराजय का सामना करना पड़ा। हार के एक नहीं कई कारण थे। अंतत: ठीकरा महानगर इकाई के अध्यक्ष कमल माखीजानी के सिर फूट गया। कमल माखीजानी की अध्यक्ष पद से विदाई पहले से तय मानी जा रही थी, क्योंकि संगठन में एक धड़ा उन्हें अध्यक्ष के रूप में स्वीकार नहीं कर पा रहा था। इस धड़े ने कमल माखीजानी को अध्यक्ष का दायित्व सौंपे जाने संबंधी फैसले को बदलने के लिए प्रदेश नेतृत्व पर सार्वजनिक रूप से काफी दबाव बनाया था। किंतु एक चूक के कारण अध्यक्ष बदलो मिशन नाकाम हो गया था। महापौर चुनाव में हुई पराजय से प्रदेश नेतृत्व को कमल माखीजानी को दायित्व मुक्त करने का मौका मिल गया। अध्यक्ष बदले जाने से अब भाजपा के आंतरिक समीकरण बदलेंगे। यह बात पार्टी के नेता भी स्वीकार कर रहे हैं। कमल माखीजानी को सांसद विवेक नारायण शेजवलकर की पसंद माना जाता था, इसलिए सबसे पहले तो सांसद की स्थिति संगठन में कमजोर होगी। नवागत अध्यक्ष अभय चौधरी केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर से जुड़े होने के कारण उनका खेमा मजबूत होगा, जो कि कमल माखीजानी के कारण संगठन की गतिविधियों से दूरी बनाए हुए थे। ज्योतिरादित्य सिंधिया की फिलहाल नवागत अध्यक्ष को स्वीकारना राजनीतिक विवशता भी है।

कमल माखीजानी का अध्यक्ष पद का कार्यकाल पूर्ण होने वाला था। किंतु संगठन आगामी विधानसभा चुनाव से पहले अंचल में नहीं प्रदेश में यह संदेश देना चाहता था कि कमजोर कड़ियों को शीर्ष पदों पर स्वीकार नहीं किया जाएगा, जबकि इस सच्चाई से नेतृत्व भी वाकिफ है कि महापौर चुनाव में पार्टी की पराजय के लिए केवल जिलाध्यक्ष दोषी नहीं हैं। उम्मीदवार चयन प्रक्रिया से लेकर चुनाव प्रचार का दायित्व संभालने वाला हर व्यक्ति इसके लिए सीधे जिम्मेदार है। राजनीति श्रेय और अपश्रेय देने के लिए ठोस वजह जरूरी नहीं होती है। यह बात भी सही है कि कमल माखीजानी अपने कार्यकाल में संगठन को एक कड़ी में जोड़ने में नाकाम रहे। संगठन में खींचतान साफ नजर आती रही। उनके कार्यकाल में केवल महापौर चुनाव में पराजय नहीं मिली, संयोग से ग्वालियर पूर्व की विधानसभा सीट कांग्रेस से छीनने का मौका मिला था। यह मौका भी भाजपा ने गंवा दिया।

सिंधिया, तोमर व शेजवलकर के बीच सामंजस्य बनाकर बड़ी चुनौती-

नवागत अध्यक्ष अभय चौधरी को प्रदेश नेतृत्व ने चौथी बार कमान इस उम्मीद के साथ सौंपी है कि वे अपने अनुभव से पार्टी के तीन ध्रुव केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, नरेंद्र सिंह तोमर व सांसद विवेक शेजवलकर के बीच सामंजस्य बिठाकर संगठन को चलाने में सक्षम होंगे। यह कार्य चुनौती पूर्ण है। भले ही संगठन दावा करे कि उनके यहां किसी तरह की कोई खेमेबाजी नहीं है। किंतु नेताओं के आचार विचार और व्यवहार में यह खेमेबाजी साफ नजर आती है। यह बात संगठन का कार्यकर्ता ही नहीं स्थानीय लोग भली भांति समझते हैं।

Posted By: anil tomar

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