जाेगेंद्र सेन, ग्वालियर नईदुनिया। कांग्रेसियों को इन दिनों महाराज यानी सिंधिया के नाम का फोबिया हो गया है। राजा व कमल नाथ के करीबी अशोक सिंह के गार्डन पर जिला प्रशासन ने जेसीबी चला दी। कांग्रेसियों ने प्रशासन व शिवराज सरकार पर हमला बोलने की बजाए शहर भर में सिंधिया के पुतले जला दिए। फूलबाग पर धरना भी दे दिया, फिर भी गार्डन पर जेसीबी चलने से नहीं रोक पाए। सिंधिया कांग्रेस छोड़ने के बाद सत्ताधारी दल के नेता अवश्य हैं, लेकिन सरकार में उनके पास कोई संवैधानिक दायित्व नहीं है। कांग्रेसियों का आरोप है कि सिंधिया के इशारे पर कमल दल में शामिल नहीं होने वालों को टारगेट किया जा रहा है। इससे पहले कांग्रेसी कह रहे थे कि कमल दल में सिंधिया की पूछ-परख नहीं है, वे दसवें नंबर के नेता बनकर रह गए हैं। इन दोनों आरोपों में कितना सच है? इसका मंथन तो पंजा दल को ही करना होगा।

हार के बाद भी कुर्सी का मोह नहीं छूट रहा

भावुकता व अन्य कारणों से मंत्री व विधायकी से इस्तीफा देना अब कुछ लोगों को अखर रहा है। इन लोगों को उम्मीद थी कि सरकार की मदद से उपचुनाव जीतने के बाद उनका रुतबा बरकरार रहेगा। फैसला किसी नेता के बंगले पर नहीं, जनता की अदालत में होना था, इसलिए कुछ तो वापसी करने में सफल हो गए। जबकि हार के कारण कुछ के लिए सरकार के दरवाजे बंद हो गए। सुर्खियों में रहने वाली इमरती देवी भी चुनाव हार गईं। अब नैतिकता के आधार पर उन्हें आज नहीं तो कल मंत्री पद से इस्तीफा देना ही है। प्रभात भी कुर्सी से चिपके मंत्रियों को नैतिकता का पाठ पढ़ा चुके हैं, लेकिन कुर्सी का मोह छूट नहीं रहा है। आगे भी कुर्सी की उम्मीद लगाए बैंठे हैं। अब कौन समझाए सरकार नेता की मर्जी से नहीं, संविधान से चलती है।

एक कार्यकाल में दोनों की कामना पूरी

ग्वालियर पूर्व विधानसभा क्षेत्र के मतदाताओं ने उपचुनाव में न्याय किया है। वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में मुन्ना भैया व सतीश भाई साहब आमने-सामने थे। एक को जीत का दूसरे को हार का हार पहनना तय था, क्योंकि क्षेत्र के लोग एक वोट से एक ही को जिता सकते थे। दोनों ने क्षेत्र में काफी मेहनत भी की थी। दोनों की अदम्य इच्छा भोपाल स्थित विधानसभा में बैठने की थी। पहले मतदाताओं ने मुन्ना भैया को जिताकर विधानसभा पहुंचा दिया। संयोग से विधानसभा के पांच साल के कार्यकाल में क्षेत्र की जनता को दूसरी बार वोट डालने का अवसर मिला। इस बार फिर दोनों आमने-सामने थे। इस बार सतीश को जिताकर विधानसभा में पहुंचा दिया और मुन्ना को घर बिठा दिया। अब लोग कह रहे हैं, इसे कहते स्मार्ट वोटिंग। विधानसभा के एक ही कार्यकाल में दोनों प्रत्याशियों की मनोकामना पूरी कर दी।

सरकार के चाबुक से सहमे कांग्रेसी

15 साल बाद सरकार में आए कांग्रेसी, सवा साल में ही नेतृत्व की खींचतान के कारण फिर विपक्ष में आ गए। प्रदेश में फिर से सरकार में आने के लिए पंजा दल के नेताओं ने उपचुनाव में पूरा जोर लगाया पर कमल दल के गणित के सामने सारे मंसूबे धरे रह गए। कमल नाथ सरकार की तर्ज पर अब शिवराज सरकार के एंटी माफिया मुहिम चलने से कांग्रेसी डरे-सहमे हैं। सपनों में जेसीबी-हथौड़े और घर के सामने पुलिस खड़ी नजर आ रही है। डर इस बात का है कि चुनाव में भलाई-बुराई जो हो गई है। अशोक भाई साहब की तरह उन्हें भी नतीजा न भुगतना पड़े। पार्टी के प्रदर्शनों में कुछ कांग्रेसी इसीलिए ताे चेहरा भी छिपाए घूम रहे हैं। फूलबाग पर तो धरने का कोई संचालन करने को तैयार नहीं था, क्योंकि सरकार के चाबूक का डर सता रहा है।

Posted By: vikash.pandey

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