children Train in Gwalior Fair: ग्वालियर. नईदुनिया प्रतिनिधि। मेला में बाल रेल का आयोजन सबसे पहले 1982 में हुआ था। जो सैलानियों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र था। लोगों के बीच छोटी रेल देखने का बड़ा कौतुहल था। बच्चे बाल रेल में बैठने की लालसा लेकर ही मेेला में अपने माता पिता के साथ घूमने आते थे। बाल रेल का आयोजन रेलवे के झांसी मंडल के डीआरएम द्वारा अफिर्सस वाइफ एसोसिएशन के द्वारा आयोजित किया जाता था। लेकिन पांच साल पहले मेला में बाल रेल से एक बच्चे के कुचलने का हादसा हुआ उसके बाद उसका संचालन बंद कर दिया गया था , लेकिन इस बार मेला प्राधिकरण ने बाल रेल के संचालन हेतु डीआरएम को पत्र लिखा है। माधवराव सिंधिया ग्वालियर मेला को 1984 में राज्य स्तरीय ट्रेडफेयर का दर्ज मिला। जिसके बाद प्रदेश सरकार द्वारा मेला में बिक्री करने पर 50 फीसद की कर में छूट दी। इस छूट से कारोबार तेजी से बढ़ा। क्योंकि जहां व्यापारियों को कर से छूट मिली तो उसका लाभ सैलानियों को मिला। मेला में खरीद करने पर सामान बाजार से सस्ता मिलता था। इसलिए लोग पूरे साल मेला में खरीदारी करने के लिए इंतजार करते थे।जिससे मेला में दुकानदारों की बिक्री बढ़ गई और कारोबार2005 तक आते आते 500 करोड़ तक पहुंच चुका था। लेकिन बीच में मेला छूट पूरी तरह से बंद कर दी गई थी। 2018-19 में फिर परिवहन विभाग द्वारा रोड टैक्स में 50 फीसद छूट देना शुरू किया। तब मेला का कारेाबार हजार करोड़ पार कर गया था। इस बार भी मेला में रोड टैक्स में छूट का इंतजार है।

माधवराव सिंधिया ग्वालियर व्यापार मेला में शिल्प् मेला की उम्र आज 35 साल हाे चुकी है। शिल्प् मेला की शुरुआत दिल्ली के प्रगतिमैदान में आयोजित होने वाले हस्त शिल्प मेला से प्रेरणा लेकर हुई थी। उसका उद्देश्य था मेला भी भव्यता बढाना। व्यापार मेला में हस्त शिल्प मेला एवं प्रदर्शनी 1988 मे सबसे पहले आयोहित की गई। असल में दिल्ली से लौटने वाले देश भर के कारोबारियों का दिल्ली से 350 किमी दूर लाखों सैलानियों वाला ग्वालियर व्यापार मेला पहले से ही आकर्षण का केन्द्र बना हुआ था। लेकिन इसको व्यवस्थित लगवाने केि लए किसी ने पहल नहीं की थी। लेकिन पहली बार 1988 में पहल की गई और उसी साल शिल्प मेला में पांच लाख रुपये की आय हुई,जिसके बाद शिल्प मेला का कारोबार बढ़ता चला गया। शिल्प मेला में खरीदारी करने के लिए शहर व उसके आसपास के धनाढय लोग साजसज्जा का सामान खरीदने का पूरे साल इंतजार करते हैं। राजा-महाराजाओं के मनोरंजन के लिए शुरू की गई लोकसंगीतों की परंपरा हमारे बचपन तक अखिल भारतीय स्तर के कवि-सम्मेलन, मुशायरा, रंगमंच तक जा पहुंची। इसके साथ ही दूसरे पारंपरिक मेलों की तरह झूला, सर्कस जैसे मनोरंजन भी शुरू हुए। लोगों को मेले में होने वाले कवि सम्मेलन और मुशायरे का इंतजार रहता था। लोग पहले सांस्क़ृतिक कार्यक्रम के हिसाब से ही मेला देखने का शेड्यूल बनाते थे।आज भी मेला में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम आकर्षण का केन्द्र बने हुए हैं।

Posted By: anil tomar

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