- फर्जी जाति प्रमाण पत्र पर बीपीएड व एमपीएड कर नौकरी पाने वाले आरोपित को किया दोषमुक्त

ग्वालियर. नईदुनिया प्रतिनिधि। अपर सत्र न्यायाधीश ने फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर एलएनआइपीई से बीपीएड व एमपीएड करने वाले एक आरोपित को दोषमुक्त कर दिया, लेकिन कोर्ट ने इस केस विवेचक व जांचकर्ता अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के आदेश दिए हैं। आदेश की कापी डीजीपी को भेजी जाएगी। कोर्ट ने कहा कि विवेचना व अभियोग पत्र पेश करते वक्त जानबूझकर कमियां छोड़ी गई हैं। केस के तथ्य देखकर ऐसा लग रहा है कि आरोपित को फायदा पहुंचाने के लिए कमियां छोड़ी गई है।

बरई निवासी बांकेलाल पाठक ने 24 फरवरी 1988 को अनुसूचित जाति का फर्जी जाति प्रमाण पत्र बनाया। इस फर्जी जाती प्रमाण पत्र के आधार पर बांकेलाल पाठक ने एलएनआइपीई में प्रवेश लिया और यहां से बीपीएड की। उसके बाद एमपीएड की। यह डिग्री हासिल करने के बाद मध्य प्रदेश लोकसेवा आयोग की ओर से आयोजित क्रीड़ा अधिकारी की परीक्षा में भाग लिया। उनका चयन भी हुआ। उन्हें प्रतापुर सरगुजा शासकीय महाविद्यालय में नियुक्ति मिली। यहां कालेज में उनसे जाति प्रमाण पत्र की कापी मांगी गई, लेकिन उन्होंने पेश नहीं की। यहां नौकरी ज्वाइन न करते हुए उत्तर प्रदेश के सोनभद्र स्थित रेणु सागर पावर प्रोजेक्ट इंटर कालेज में नौकरी की शुरुवात की। अनुसूचित जाति का फर्जी प्रमाण पत्र हासिल करने के फर्जीवाड़े का भांडा फोड़ उनकी पत्नी रजनीदेवी ने किया। वरिष्ठ अधिकारियों से शिकायत की। इसकी जांच की गई तो पूरा फर्जीवाड़ा सामने आ गया। कोतवाली थाने में आरोपितों के खिलाफ 2003 में अलग-अलग धाराओं में आपराधिक केस दर्ज किया। विवेचना के बाद कोर्ट में चालान पेश किया। पुराना केस होने की वजह से कोर्ट ने इसकी सुनवाई पूरी की। आरोपित के अधिवक्ता संजय शर्मा ने बचाव में तर्क दिया कि जो आरोप लगाए गए हैं, पुष्ट नहीं हैं। जाति प्रमाण पत्र भी नहीं है। इसलिए अपराध भी नहीं बनता है। कोर्ट ने बांकेलाल पाठक को दोषमुक्त कर दिया, लेकिन जांच में गड़बड़ी करने वाले विवेचक व जांच अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के आदेश दिए हैं।

जांच के दौरान यह कमियां छोड़ी गईं

- शिकायत फर्जी जाति प्रमाण पत्र से जुड़ी थी। विवेचना अधिकारी ने मूल जाति प्रमाण पत्र को जब्त नहीं किया गया। कोर्ट ने भी कई बार अवगत कराया, लेकिन पुलिस अधिकारियों इसे गंभीरता से नहीं लिया।

- एलएनआइपीइ में प्रवेश लेने, सरगुजा कालेज व सोनभद्र में नियुक्त लिए जाने के संबंध में कोई दस्तावेज जब्त नहीं किया।

- जाति प्रमाण पत्र के दायरा रजिस्टर को जांच के दायरे में नहीं लिया।

- तहसीलदार व पटवारी को विवेचना के दौरान जारी किए गए पत्रों को चालन में पेश नहीं किया।

- शिकायतकर्ता ने आवेदन दिया था, उसकी प्रधान आरक्षक ने की थी। चालान में प्रधान आरक्षक के प्रतिवेदन को संलग्न नहीं किया गया।

Posted By: anil tomar

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