ग्वालियर। महाराजपुरा थाना प्रभारी वायएस तोमर को एससी/एसटी एक्ट व मारपीट के मामले में दो आरोपितों को गिरफ्तार करना महंगा पड़ गया है। विशेष सत्र न्यायाधीश बीपी शर्मा ने कहा कि 7 साल से कम सजा वाले अपराध में आरोपितों की गिरफ्तारी जरूरी नहीं है, लेकिन पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया है।

गिरफ्तारी के पर्याप्त कारण नहीं बताए हैं और न गिरफ्तारी संबंधी चेक लिस्ट लगाई है। यह सुप्रीम कोर्ट के न्याय दृष्टांत का उल्लंघन है। इसलिए पुलिस अधीक्षक संबंधित थाना प्रभारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई कर कोर्ट को सूचित करें। साथ ही कोर्ट की अवमानना करने पर अलग से एमजेसी दर्ज की जाए। कोर्ट ने न्यायिक हिरासत की मांग को खारिज करते हुए दोनों को रिहा कर दिया। संसद में एससी-एसटी एक्ट में संशोधन होने के बाद पहली कार्रवाई है।

महाराजपुरा थाने के आरक्षक केशव सिंह कौरव ने सोमवार को आरोपित सुरेश सिंह चौहान व दिनेश सिंह चौहान को विशेष सत्र न्यायालय में केस डायरी के साथ पेश किया। दोनों की गिरफ्तारी धारा 323, 294, 506, व एससी-एसटी एक्ट के तहत दिखाई गई। पुलिस ने दोनों की गिरफ्तारी की सूचना उनके परिजनों को नहीं दी। न चिकित्सकीय परीक्षण कराया है। केस डायरी के साथ एक पत्र पेश किया गया गया, जिसमें निवेदन किया कि आरोपितों को 6 अक्टूबर तक न्यायिक अभिरक्षा (जेल) में भेजा जाए।

इसके बाद कोर्ट ने केस डायरी का अवलोकन किया। कोर्ट ने माना कि पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा अर्नेश कुमार विरुद्ध बिहार के केस में जो आदेश दिया था, उसका उल्लंघन हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने अर्नेश के केस में गिरफ्तारी को लेकर स्पष्ट उल्लेख किया है कि किसी व्यक्ति को अनावश्यक रूप से गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है।

अगर गिरफ्तार किया जाता है तो आवश्यक कारण बताते हुए जांच अधिकारी चेक लिस्ट केस डायरी के साथ लगानी होगी। केस डायरी में गिरफ्तारी के जो कारण बताए हैं, उनका परीक्षण न्यायालय द्वारा किया जाएगा। विशेष न्यायालय ने जब इस केस का परीक्षण किया तो व्यक्ति को अनावश्यक रूप से गिरफ्तार करना पाया गया। इसमें आरोपितों के गिरफ्तारी की जरूरत नहीं थी। कोर्ट ने टीआई के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के आदेश पुलिस अधीक्षक को दिए हैं।

पुलिस ने इन बातों का नहीं रखा ध्यान

-विशेष न्यायालय ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि सुप्रीम कोर्ट ने जोगिंदर सिंह विरुद्ध उत्तर प्रदेश के केस में गिरफ्तारी में गाइड लाइन निर्धारित की है। गंभीर अपराध को छोड़कर शेष में पुलिस को गिरफ्तारी से बचना चाहिए।

- दो आरोपियों ने विशेष कोर्ट ने अग्रिम जमानत आवेदन पेश किया था, लेकिन उनका आवेदन खारिज कर दिया था। कोर्ट ने आदेश दिया था कि गिरफ्तारी करने वाले अधिकारी न्याय दृष्टांट जोगिंदर सिंह के केस के दिशा निर्देशों का पालन करें। विशेष न्यायालय के आदेश बाद भी गिरफ्तार कर लिया।

- धारा 323, 294, 506, व एससी-एसटी एक्ट के तहत केस दर्ज है। सभी धाराएं जमानती हैं। सात साल से अधिक सजा का प्रावधान नहीं है।

- केस डायरी का बारीकी से अवलोकन किया। विशेष लोक अभियोजक अभय पाटिल को भी अवलोकन कराया। इसमें अंतिम पर्चा 13 सितंबर का है।

अन्वेषण पूर्ण करने के लिए नहीं थी गिरफ्तारी की जरूरत

कोर्ट ने केस का अवलोकन करने के बाद कहा कि गिरफ्तारी की कोई जरूरत नहीं थी। न आरोपित केस को प्रभावित कर सकते थे और न फरार होने की संभावना थी। दोनों आरोपियों को अनावश्यक रूप से गिरफ्तार किया गया है। सुप्रीम कोर्ट के न्याय दृष्टांतों का भी ध्यान नहीं रखा है। अतः न्यायालय दोनों आरोपितों का अवैध निरोध अस्वीकार कर रिहा करती है।

क्या है मामला

9 सितंबर 2018 को शांति देवी अपने दरवाजे पर खड़ी थी। तभी पड़ोस में रहने वाली महिलाओं ने शांति देवी से कहा कि चेंबर साफ कर गंदगी उनके दरवाजे पर क्यों फेंक दी। महिलाओं में मुंहवाद होने लगा। तभी दोनों आरोपित मौके पर आ गए। शांतिदेवी को जाति सूचक गालियां देना शुरू कर दी। शांति देवी व मनोज कुमारी को चोटें नहीं आई, जिसके चलते मेडीकल नहीं कराया। पुलिस ने सुरेश व दिनेश चौहान के खिलाफ अलग-अलग धाराओं में केस दर्ज कर लिया।

मोहना थाने प्रभारी के खिलाफ भी दिए थे आदेश

मोहना थाना प्रभारी एसएल प्रजापति ने भी एससी-एसटी एक्ट के तहत एक आरोपित की गिरफ्तारी की। इस केस में गिरफ्तारी की जरूरत नहीं थी। बावजूद इसके गिरफ्तार कोर्ट में पेश कर दिया था। कोर्ट ने मामले को संज्ञान में लेते हुए एसपी को कार्रवाई के लिए पत्र लिखा था।

कार्रवाई के आदेश

महाराजपुरा थाने ने गलत गिरफ्तारी की थी और आरोपितों को रिहा करते हुए कोर्ट ने थाना प्रभारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के आदेश दिए हैं।

अभय पाटिल, विशेष लोक अभियोजक