Dol Gyaras 2022: ग्वालियर, (नईदुनिया प्रतिनिधि)। जलझूलनी एकादशी (डोल ग्यारस) मंगलवार को मनाई जाएगी। डोल ग्यारस से ही गणेशजी की विदाई के साथ विसर्जन का सिलसिला शुरू हो जाता है। नगर के सागरताल सहित अन्य सरोवरों पर गणेश मूर्तियों के विसर्जन की व्यवस्था नहीं की गई है। डोल ग्यारस पर नगर निगम द्वारा मूर्तियों के विसर्जन की कोई व्यवस्था नहीं की गई है। अगर मिट्टी की गणेशजी की मूर्ति विराजित की है तो घर में शुद्ध जल की व्यवस्था कर मूर्ति का विसर्जन किया जा सकता है। इस पानी काे मिट्टी के गमलों में डालकर पौधे रोपे जा सकते हैं।

ज्योतिषाचार्य पं रवि शर्मा ने बताया कि भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी बहुत ज्यादा धार्मिक महत्व है, इसे परिवर्तन एकादशी, डोल ग्यारस या जलझूलनी एकादशी भी कहते हैं। इस वर्ष यह पर्व मंगलवार को मनाया जाएगा।इस दिन भगवान विष्णुजी की पूजा की जाती है। साथ ही इस दिन से ही गणेश प्रतिमाओं के विसर्जन की शुरुआत हाेती है, ये सिलसिला अनंत चतुर्दशी तक जारी रहता है।

एकादशी तिथि प्रारंभ मंगलवार को प्रातः 05:54 बजेः एकादशी तिथि का समापन बुधवार की दोपहर से शुरू हाेगा। इसके बाद ये सिलसिला अनंत चतुर्दशी तक जारी रहने वाला है।

ऐसे करें पूजा-अर्चनाः भगवान विष्णुजी की पूजा के लिए समर्पित इस पावन तिथि को भगवान विष्णु के कृष्ण रुप की धूप,दीप,पीले फूल, पीली मिठाई से पूजा की जाती है। सात कुंभ(मटके)स्थापित कर उनमें सात तरह के अनाज भरकर एक कुंभ के ऊपर भगवान विष्णु की मूर्ति अथवा फोटो स्थापित कर पूजा की जाती है और अगले दिन द्वादशी को ब्राह्मणाें को दान कर दिए जाते हैं। इस दिन चावल का सेवन नहीं किया जाता है। भगवान विष्णु ने अपने शयनकाल के दौरान इस दिन करवट बदली थी, इस कारण इसे परिवर्तन एकादशी भी कहा जाता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार भगवान कृष्ण माता यशोदा व नंदबाबा के साथ प्रथम बार नगर भ्रमण पर निकले थे। कुछ क्षेत्रों में डोल ग्यारस गणेश जी के विसर्जन से संबंधित भी है।

Posted By: vikash.pandey

NaiDunia Local
NaiDunia Local
  • Font Size
  • Close