ग्वालियर, नईदुनिया प्रतिनिधि। दानाओली के बाजार में बनने वाली छोटे आकार की दयाराम की कचौरी का नाम आते ही मुंह में पानी आ जाता है। कचौरी का स्वाद लेने वाले बरबस ही दुकान की ओर खिंचे चले आते हैं। यहां सुबह से शाम तक बच्चों के खिलौने के आकार की कचौरी के घान उतरते चढ़ते रहते हैं, लेकिन कचौरी खाने के शौकीन शहरवासियों की भीड़ कम होते नजर नहीं आती।

यशोदा देवी ने खेल-खेल में की थी कचौरी बनाने की शुरुआत: दानाओली में दयाराम की कचौरी के नाम से मशहूर दुकान संचालक गणेश गुप्ता ने बताया कि 111 वर्ष पूर्व उनकी दादी यशोदा देवी ने बच्चों के लिए खिलौने की तरह छोटी कचौरी बनाई थी। कचौरी का स्वाद इतना अच्छा लगा कि उन्होंने बच्चों की मांग पर कचौरी बनाकर हलवाट खाना स्थित बाजार में बेचना शुरू कर दिया। दादी के देहांत के बाद यह विरासत उनके पिता दयाराम गुप्ता ने संभाली और यह दयाराम कचौरी के नाम से मशहूर हो गई। दुकान का नाम भी पिता के नाम से ही है। पिता की मौत के बाद दादी यशोदा की कचौरी का स्वाद उनके पोते गणेश गुप्ता अब भी सहेज कर लोगों तक पहुंचा रहे हैं।

एक इंच छोटे आकार और स्वाद के लिए मशहूर है: दयाराम की कचौरी आकार में एक इंच छोटी होने के साथ स्वादिष्ट भी है। स्वाद के लिए इसमें घर पर ही कुटे व पिसे हुए मसालों का उपयोग किया जाना। आकार छोटा होने से उसके अंदर भरा हुआ मसाला अच्छे से सिक जाता है।

आपातकाल से कैरोसिन के चूल्हे पर तली जाती है कचौरी: पहले यह मिट्टी के चूल्हे पर लकड़ियां जलाकर बनाई जाती थी। आपातकाल के समय चूल्हा जलाना मुमकिन नहीं हुआ तो घर के भीतर कैरोसिन के स्टोव पर बनाना शुरू किया । उसके बाद अब तक केरोसिन के स्टोव पर ही बनाते हैं।

एक रुपये में 32 कचौरी देते थे, अब 10 रुपये की चारः गणेश गुप्ता ने बताया कि जब से उन्होंने होश संभाला तब एक रुपये में 32 कचौरी देते थे, जो कि अब 10 रुपये में चार देते हैं। कचौरी के अलावा समोसा,मंगोड़े और पकौड़ी भी बनाकर विक्रय करते हैं। कचौरी में काली मिर्च, हींग, जीरा, सौंफ, धनिया सहित कई तरह के मसालों को पीस कर घर पर ही मसाला तैयार करते हैं। हरी व मीठी चटनी के साथ कचौरी देते हैं।

Posted By: vikash.pandey

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