Gwalior injection ka dose: अजय उपाध्याय, ग्वालियर नईदुनिया। जीआर मेडिकल कालेज के अड़ियल बाबा का शिगूफा और लोग दौड़ लगाने लगे, पर समझ किसी को नहीं आ रहा मुखिया कौन बनेगा, क्योंकि बाबा खुद को अस्वस्थ बताकर सहानुभूति जुटा रहे हैं। असल में बाबा का खेल निराला है। उन्होंने हाल ही में नेताजी को उनकी असली जगह तो दिखा दी पर मुखिया की हसरत पाल कर बैठे लोगों को धोबी पछाड़ मारने की तैयारी में हैं। इसके लिए उन्होंने बड़े ठाकुर से लेकर पगड़ी वाले बाबा के मन की खटास को दूर करने की औषधि तैयार की है। इधर विपक्षी दिमागी घोड़ा दौड़ा रहे हैं कि मुखिया कौन बनेगा। उन्होंने इंदौर से लेकर कमलाराजा तक कसरत कर डाली पर समझ नहीं आ रहा किसके सिर ताज बंधेगा। क्योंकि पता चले तो पटखनी दें, पर पर्दे के पीछे का खेल कुछ और है, जो अभी पर्दे में रहने दो, पर्दा न हटाओ।

मंत्री-विधायक का स्टाफ बना फ्रंटलाइनरः कोरोना वैक्सीन के चलते विधायक व मंत्री का निजी स्टाफ फ्रंटलाइन वर्कर बन गया है। हुआ यूं कि कोरोना वैक्सीन का टीका लगवाने के लिए दो शर्तें थीं। पहली तो 60 साल से अधिक उम्र और दूसरी 45 से अधिक हो तो गंभीर बीमारी होना जरूरी है, पर मंत्री और विधायक का निजी स्टाफ इन दोनों ही शर्तों को पूरा नहीं कर सकता था। जबकि टीकाकरण जरूरी था, क्योंकि ऐसा नहीं होता कि आमजन को मिलने वाली सरकारी योजना का लाभ मंत्री व विधायक न उठाएं। मंत्री व विधायकों ने फोन घुमाया और जयारोग्य प्रबंधन एक पैर पर खड़ा हो गया। दोनों शर्तों को एक ओर रखा और मंत्री व विधायक के स्टाफ का टीकाकरण शुरू कर दिया। अब समस्या थी कि संजीवनी तो दे दी पर सरकार को बताएं क्या, प्रभारी साहब ने दिमाग लड़ाया और स्टाफ को फ्रंटलाइनर बताकर आनलाइन डेटा भेज दिया।

बुरी नजर वालो, कुछ तो शर्म करोः आज के हालात में सरकारी हो या निजी क्षेत्र, नौकरी करना मुश्किल हो गया है। सबसे अधिक परेशानी महिलाओं को उठानी पड़ती है। क्योंकि उन्हें घर परिवार से लेकर समाज का ध्यान भी रखना होता है। गजब की बात यह है कि साथ में काम करने वालों की जब हसरत पूरी न होती तो वही उन्हें झूठे केस में फंसाने से गुरेज भी नहीं करते। अभी हाल ही में जिला अस्पताल का वाक्या जहां पर महिला डाक्टर को झूठे जातिगत केस में महज इसलिए फंसा दिया कि उसने साथी डाक्टर की गलत हरकत पर पुलिस में शिकायत की थी। जिन्हें डाक्टर को न्याय दिलाना था, उन्होंने ही आरोपित बना दिया। कुछ यही हालात जेएएच के हैं, जहां पर डाक्टर की बात न मानने पर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों से परेशान कराया जाता है, अब यहां भी पीड़िता पुलिस से मदद मांगने पहुंची है ।

तब बुलाने पर भी नहीं आएः कोरोना के आंकड़ों ने इस कदर डराया कि बुजुर्गों को टीकाकरण की अहमियत समझ आ गई। जब वैक्सीनेशन शुरू हुआ था तब बुजुर्गों को बुलाकर टीकाकरण करना पड़ रहा था। इसके बाद भी वह वैक्सीन लगवाने को तैयार नहीं हो रहे थे। जैसे ही कोरोना ने रफ्तार बढ़ाई और दो सौ का आंकड़ा पार किया तो सबको समझ में आ गया कि अब कोरोना की वैक्सीन ही संजीवनी है। क्योंकि संजीवनी भले ही संक्रमित होने से न रोक सके पर मरने नहीं देगी। जो बुजुर्ग हाथ पैरों में दर्द और चलने फिरने में असमर्थता जता रहे थे, वह अब दौड़ लगाकर केंद्रों पर टीकाकरण कराने पहुंच रहे हैं। टीकाकरण जरूरी है पर सावधानी उससे भी ज्यादा जरूरी है। भीड़ में खड़े होकर टीका लगवाने का क्या फायदा। कम से कम जब टीका लगवाने जाएं तो भीड़ न लगाएं, क्योंकि कोरोना भीड़ से फैलता है।

Posted By: vikash.pandey

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