Gwalior kano dekhi column news: जोगेंद्र सेन, ग्वालियर नईदुनिया। महाराज और राजा के बीच सियासी रार चंबल के बीहड़ों की तरह चर्चित रहती है। राजा से राजनीति के मंच पर तलवारें खिंचने के बाद महाराज ने अपनी सियासत की दिशा व दशा दोनों ही बदल ली हैं। महाराज व राजा का भोपाल में पड़ोसी बनना संयोग मात्र है या सियासी शरारत है। इस सवाल पर प्रदेश की राजधानी से लेकर अंचल में बहस छिड़ी हुई है। चाणक्य ने भी पड़ोसी से मधुर संबंध रखने की सलाह दी है। अब सवाल उठता है कि पड़ोसी होने के नाते महाराज व राजा के संबंध सुधरने की कोई गुजांइश है। दोनों के बीच सुलह की कल्पना करने वालों को निराश होना पड़ सकता है, क्योंकि दोनों के बीच सियासी जंग भारत-पाक की तरह छिड़ी हुई है। यह रार सियासी होती तो सुलह की उम्मीद हो सकती थी, यहां तो दुश्मनी राजघरानों की है।

मेले का विरोध कर फंसे कमलदल के मुखियाः व्यापार मेला शहर की पहचान है। इस बार मेले पर कोरोना के संकट के बादल मंडरा रहे थे, लेकिन व्यापारियों के संघर्ष से मेला लगना अब तय है। एक बैठक में कोरोना की आड़ लेकर मेला लगाने का विरोध कर कमलदल के मुखिया लोगों के टारगेट पर आ गए। इंटरनेट मीडिया पर ट्रोल भी हुए। अब लोग इस विरोध का सियासी कारण तलाश रहे हैं। कमलदल के मुखिया की गिनती सांसदजी के खेमे से होती है, इसलिए सवाल उठना लाजमी है। यह विरोध मुखिया की व्यक्तिगत राय है या फिर उनके खेमे की राजनीति का हिस्सा। व्यापारी भी मेला लगवाने के लिए महल के चक्कर लगा रहे हैं, सांसद के दरवाजे पर वे एक भी बार नहीं गए। आखिर वे भी वजनदार जनप्रतिनिधि हैं। वैसे भी मान्यता है कि स्थान देवता को मनाए बगैर कोई भी शुभ कार्य होने में बाधाएं तो आती हैं।

होर्डिंग्स की संख्या से तय होती है नेताजी की टीआरपीः कमलदल के मीडिया प्रभारी ने होर्डिंग्स को लेकर अनुकरणीय उदाहरण पेश किया। दल के अध्यक्ष को यह बात जम भी गई। ऐसा माना जा रहा है कि दल में अनुशासन की कमजोर डोर का कारण इन होर्डिंग्स की कुसंस्कृति ही हैं। होर्डिंग्स के जरिए राजनीति करने वालों को संगठन के नीति-रीति व सिद्धांतों से कोई सरोकार नहीं होता। उनकी नजर तो अपने नेता पर रहती है। उनकी आंखों का तारा बनने के लिए उनके आगमन की सूचना मिलते ही नेताजी के फोटो के साथ अपना सुंदर से चित्र का होर्डिंग्स सड़कों पर लटका देते हैं। अध्यक्षजी नेता पुत्र तो अब अपना जन्मदिन भी होर्डिंग्स के माध्यम से ही मनाते हैं। होर्डिंग्स से नेता की टीआरपी तय होती है। ऐसे में होर्डिंग्स की कुसंस्कृति पर क्या सिर्फ आपके भाषण से अंकुश संभव है, या फिर नेतृत्व को गाइडलाइन भी बनानी पड़ेगी।

राजा ने दिया अपने बेटे को मौकाः मुरैना में पंजे दल का मंच किसानों के नाम से सजा था, लेकिन यह शुद्ध सियासी मंच था। इस मंच का लक्ष्य भी तय था। इसलिए पंजे दल के लोगों ने केंद्रीय मंत्री के गृह जिला व संसदीय क्षेत्र को चुना था। मंच पर सरकार गंवाने वाले छिंदवाड़ा के बगैर तिलक के राजा व अपने पुत्र के लिए सियासी जमीन तैयार कर रहे राघौगढ़ के राजा पुत्र सहित विराजमान थे। सभी अपने शब्दरूपी हथियारों पर धार रखकर आए थे। राजा के हमला करने की बारी आने से पहले उनके चिरंजीव को मौका दिया गया। इसके बाद राजा को बुलाया गया। राजा को प्रदेश की राजनीति का मंझा हुआ खिलाड़ी माना जाता है। राजा दिल्ली पर हमला बोलने से यह कहकर पीछे हट गए कि एक ही मंच से पिता-पुुत्र का बोलना उचित नहीं है। अब लोग राजा के नहीं बोलने का कारण तलाश रहे हैं।

Posted By: vikash.pandey

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