चुनावी पात्र मिस्टर बंटाढार की वापसी

साध्वी ने 2003 के विधानसभा चुनाव में राजा को प्रदेश की सत्ता से बेदखल करने के लिए अपने ओजस्वी भाषणों से चुनावी पात्र मिस्टर बंटाढार को जन्म दिया था। इस पात्र के जाल से राजा 17 साल बाद भी बाहर नहीं निकल पाए हैं। इस पात्र पर विरोधियों के हमले का असर राजा के साथ संगठन पर भी पड़ता है, इसलिए वे चुनाव से किनारा कर लेते हैं। कमल दल वाले उपचुनाव में बंटाढार के पात्र को फिर से जीवित करने के लिए मंत्र पढ़ रहे थे। इस बार राजा ने भी साहस दिखाया है। सोशल मीडिया के माध्यम से चुनाव में धमाकेदार वापसी का प्रयास किया है। वे अपने खुरापती दिमाग से नया ही गणित लेकर आए हैं। उन्होंने लोगों को बताया कि आपका मत किसने-कितने में बेचा और खरीदा है, इस खरीद-फरोख्त की सच्चाई तो महाराजा ही जानते हैं, हम नहीं।

पुराने दोस्तों के पेट में हो रहा दर्द

कमल दल में 30 सदस्यीय स्टार प्रचारकों की सूची में महाराज का नाम 10वें नंबर पर होने से उनके पुराने दल के दोस्तों के पेट में दर्द हो रहा है। दुख जताते हुए तंज भी कस रहे हैं- 'राहुल व प्रियंका के समकक्ष रहने वाले महाराज की अब क्या दुर्दशा हो रही है।' पुराने मित्र यह बात भूल गए कि उन्हें सूबे का मुखिया बनाने के लिए उनके अनुयायियों ने दिल्ली से लेकर भोपाल तक में न जाने कितने दरवाजों पर दस्तक दी। हाइकमान ने भी अनसुना कर दिया। चुनाव के बाद पद व सम्मान नहीं मिलने के कारण महाराज को कांग्रेस छोड़नी पड़ी। अब वही दोस्त उनके मान-सम्मान की बात कर रहे हैं। अब उनके शुभचिंतकों को कौन समझाए कि कांग्रेस में उनकी वरिष्ठता 20 साल की थी। कमल दल में उन्हें आए अभी नौ माह भी पूरे नहीं हुए हैं।

वह भोली हैं, उनकी भावनाओं को समझें

अंदाजा लग गया होगा कि किसकी बात हो रही है। जी हां, हम चर्चा कर रहे हैं महाराज की अंध भक्त मंत्री की। वह कब क्या बोल दें, किसी को नहीं पता। पहले पंजे दल के लोग उनके भोलेपन से परेशान थे और कमल दल के लोग खूब मजे लेते थे। अब इनके बयानों से कमल दल के लोग सिर खुजाने लगते हैं। कभी कलेक्टर के माध्मय से चुनाव जीतने की बात कर देती हैं तो कभी कह देती हैं कि मेरे क्षेत्र में सच्चे नारियल फूटे हैं। डिप्टी सीएम बनने की महत्वकांक्षा भी सहज भाव से व्यक्त कर देती हैं। पीताबंरा नगरी का प्रतिनिधित्व करने वाले पंडितजी भी पहले इनकी बातों का आनंद लेते थे। अब परिवार का सदस्य बन जाने पर वे भी कह रहे हैं- वह भोली हैं, उनके शब्दों की जमावट गलत हो सकती है पर भावनाएं गलत नहीं हैं।

संभलकर रहें कोरोना अभी दरवाजे पर है

कोरोना संक्रमण से अक्टूबर का पहला पखवाड़ा अंचल में राहत भरा रहा है। संक्रमण दर गिरने के साथ मृत्यु दर भी घटी है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हमने कोरोना से मुक्ति पा ली। कोरोना अब भी हमारे दरवाजे पर खड़ा है। हमें अपनी गिरफ्त में लेने के लिए एक छोटी सी चूक का इंतजार कर रहा है। अंचल में चुनाव की गतिविधियां चरम पर हैं। चुनाव से मुंह भी नहीं मोड़ा जा सकता है। इन रैलियों व सभाओं में जाना कुछ लोगों की मजबूरी हो सकती है, पर यह भी नहीं भूलें कि परिवार व समाज को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी भी आपके कंधों पर हैं। हमारी तो सलाह है सियासी कार्यक्रमों में भाग लेते समय मास्क बिल्कुल न उतारें। हाथों को सैनिटाइज करते रहें, क्योंकि विशेषज्ञों ने चुनाव के बाद कोरोना संक्रमण में विस्फोट होने की आशंका जताई है।

Posted By: Nai Dunia News Network

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