- गंगादास की बड़ी शाला में अस्त-शस्त्र व तोप का पूजन

- हर साल दशहरे पर होता है आयोजन

ग्वालियर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। गंगादास की बड़ीशाला में दशहरा के अवसर पर सोमवार को शस्त्रों का पूजन किया गया। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के साथ युद्ध में शहीद हुए 745 नागा साधुओं के शस्त्र और तोप का पूजन महंत रामसेवक महाराज ने किया। हर साल दशहरे पर यहां इन शस्त्रों का पूजन किया जाता है। हालाकि झांसी की रानी के अस्त्र-शस्त्र नगर निगम संग्रहालय में रखे हुए हैं।

यह है इतिहासः झांसी की रानी के गुरु पुरनविराठी पीठाधीश स्वामी गंगादास जी महाराज रहे थे। रानी बचपन में ग्वालियर आई और उन्हें गुरु बनाया था । अंग्रेजों के विरुद्ध पहला संगठित संग्राम 1857 में हुआ था। तब रानी लक्ष्मीबाई दतिया से ग्वालियर सिंधिया से मदद मांगने आई थीं, लेकिन वह उनसे नहीं मिले। महल से निकलकर वह आई तब उनका घोड़ा स्वर्णरेखा नदी को पार नहीं कर सका और वह गिर गया। गिरने के बाद भी रानी लक्ष्मीबाई ने एक अंग्रेज का घायल कर दिया और वह घायल होकर बेहोश हो गई थी। इसके बाद उन्हें रघुनाथ सिंह ने देखा और उनका चेहरा गीले कपड़े से साफ किया। इसके बाद रानी को होश आया। रघुनाथ सिंह से उन्होंने पूछा कि मैं कहा हूं। गंगादास की बड़ी शाला का नाम सुनते ही रानी ने उनसे शाला जाने को कहा। जब वह गुरु के पास आई तो उन्होंने कहा कि मैं अब नहीं जी सकूंगी, लेकिन मेरे शरीर और मेरे बेटे को अंग्रेजों के हाथों में नहीं पड़ने देना। इसके बाद जब अंग्रेजों ने शाला को बाहर से घेर लिया। तब शाला में मौजूद लगभग दो हजार साधुओं ने रानी के साथ लड़ने को कहा, क्योंकि नागा साधु अस्त्र-शस्त्र और तोप चलाने में सक्षम थे, इसलिए उन्होंने रानी की मदद की। इस युद्ध में 745 नागा शहीद हुए और रानी के पुत्र को लेकर दो साधुओं को शाला से भगा दिया। इसके बाद अंग्रेजों ने मठ को उजाड़ दिया और संपत्ति को लूटा।

Posted By: Nai Dunia News Network

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